हिंदू कोड-जारी - Page 554

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आधिपत्य प्राप्त कर लिया है। हिंदू कानून मूलतः एक लिखित कानून नहीं है बल्कि एक पारम्परिक कानून है और यह समय-समय पर मनु, याज्ञवल्क्य व अन्य दूसरों द्वारा संहिताबद्ध किया गया है।

इन विषयों पर पिछले सौ वर्षों में भारत के विधानमंडल की कठिनाई का अनुभव हुआ है, और उन्होंने विशिष्ट कमियों के बारे में, जिन्हें बाद में हटा दिया गया था, निश्चित कानून बनाए थे। अब एक-विवाह प्रथा और तलाक के संबंध में बदलाव लाने के लिए माँग उठ खड़ी हुई हैं। हम इसे स्वीकार कर लेते हैं, परन्तु आप कैसे मान लेते हैं कि जहाँ तक रिवाजी कानूनों का संबंध है, उनमें बदलाव क्या है? यह एक प्राकृतिक कानून है, एक गतिशील कानून है, एक प्रगतिशील कानून है, इसने समय की आवश्यकता का बल प्राप्त कर लिया है, यदि आप इस विकासशीलता को स्वीकृति नहीं देंगे तो समाज की गतिशीलता को स्वीकृति नहीं देगे तो आप फिर कठोर हो जायेंगे, आप उसी प्रकार हिंदू समाज को हानि पहुँचा रहे होंगे जैसे आपके अनुसार गत् 3, 000 वर्षों से मनु के कानून ने पहुँचाई है। क्या आप चाहते हैं कि समाज के अधिकतर भागों में जो उस कानून द्वारा शासित नहीं किया जाता है, यह अपराध कम किया जाना चाहिए? यह सदन एक-विवाह प्रथा और तलाक के सिद्धांतों पर अडिग खड़ा है। अब प्रगतिशील युग में आप उन बातों के विषय में, जिन्हें आप सुविधाएँ देना चाहते हैं, मुश्किलें पैदा करना चाहते हैं? मेरे लिए तो, यह पूर्णतया कल्पनातीत है कि आप ऐसा करना चाहते हैं। यह एक अवनतिशील कदम होगा।

रिवाजी कानून को बनाए रखने का एक दूसरा कारण भी है। यह राज्य के लिए असंभव होगा कि वह तलाक और कानूनी पृथकीकरण के मामलों को सुलझाने के लिए पर्याप्त संख्या में न्यायिक अधिकारियों और जजों को बनाए रखे। (एक माननीय सदस्यः सरकार के पास पर्याप्त धन है।) उनके पास पर्याप्त धन नहीं है यहाँ तक कि सामान्य मामलों को जो बहुत महीनों से साथ-साथ चल रहे हैं, सुलझाने के लिए जज रखने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। आपको कोई अनुमान नहीं है, कि कितने और जजों की आवश्यकता होगी। यदि आपके पास धनराशि है और आप इसके लिए कृत- संकल्प हैं, तो क्या आप इससे जुड़ी कठिनाइयों को जानते हैं? खर्च की ओर से उपेक्षा बरती जा सकती है, पर कठिनाइयों को उपेक्षित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इस देश में दुर्भाग्य से कोई नागरिक जब-जब भी सरकारी तंत्र के संपर्क में आता है, वह कदम-कदम पर कष्ट ही झेलता है। मैं स्वयं सरकारी तंत्र का एक अंग हूँ ओर मुझे इन बातों का स्पष्ट अनुमान है। मेरा कुछ प्रभाव है, लेकिन यदि मैं एक सामान्य अशासकीय व्यक्ति होता और मुझे कानून की अदालत में जाना पड़ता