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और, यह अप्रार्थित है। इसके लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं है। रिवाजी कानून रद्द करने के लिए कोई भी मामला बनाया गया है, तलाक के क्षेत्र को प्रतिबंधित करने के लिए नहीं बनाया गया है। आप इस विधान को क्यों लागू करना चाहते हैं जो लोगों की इच्छा के अनुरूप नहीं है और इस अधिनियम की आत्मा के विरुद्ध जाता है। यह अधिनियम तलाक को प्रश्रय देता प्रतीत होता है और आप उसे प्रतिबंधित करना चाहते हैं। यदि इस दावे की कुछ भी वैधता है, तो मैं कानून मंत्री से इस मामले पर ध्यानपूर्वक और सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के लिए अनुरोध करता हूँ।
* श्री ओरांव : श्रीमान्, मुझे इस हिंदू संहिता विधेयक के बारे में अधिक नहीं बोलना
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था; लेकिन अब हमारे सामने ऐसी स्थिति आ गई है जो मुझे कुछ बोलने के लिए विवश कर रही है। मेरे कहने का अर्थ है कि अनुसूचित जनजाति और आदिवासी न तो हिंदू हैं न मुस्लिम हैं और न ही ईसाई हैं उनका कोई धर्म नहीं है। पहला तो उन्हें इस विधेयक में सम्मिलित नहीं किया गया था और न वे स्वयं को इसमें घसीटना ही चाहते थे। लेकिन अब मैंने पाया है कि इस विधेयक में हम भी घसीट लिए गए हैं। मेरे कहने का मतलब है कि तलाक जो हमारे समुदाय में होते हैं, शायद दुनिया के किसी अन्य हिस्से में न होते हों। हम जानते हैं कि 80 या 85 प्रतिशत से अधिक तलाक तो विवाह के परिणामस्वरूप उत्पन्न एक भी बच्चे से पूर्व ही हो जाते हैं। यदि वहाँ कोई कार्यवाई की जाए अथवा तलाक लिया जाए तो हम पंच के साथ मामला दर्ज कराने में अक्षम रहेंगे। यह कहा जाता है कि मामले को अपनी
खुद को पंचायतों में दर्ज कराया जाना चाहिए। उस जगह का मुखिया अदालत में जाकर अर्जी देगा। यदि दोनों-स्त्री व पुरुष, जो तलाक लेने आए हैं उसके निर्णय से सहमत नहीं हैं, तो मामले की फिर आगे सुनवाई अदालत में होगी। हम जानते हैं कि कितने तलाक होते हैं। यहाँ तक कि 18 महीनों में तो मामले दर्ज किए जायेंगे और केवल 12 महीनों में ही निर्णीत कर दिए जायेंगे। हिंदू संहिता विधेयक में हमें जकड़ा जाना, इसलिए अन्याय ही नहीं बल्कि, हमारी वास्तविक मृत्यु है। इसलिए विद्वान डॉक्टर से मेरा निवेदन है कि हमें इसलिए इसमें से निकाल दें।
आगे, जो भी हमने हिंदू संहिता विधेयक में देखा है, उसमें अच्छाई और बुराई दोनों हैं। हो सकता है कि शहरों में रहने वाले लोग इसे न जानते हों, लेकिन हम ग्रामीण लोग हैं और सभी तरह के लोगों में से आए हैं। उनमें से सभी इसके विरुद्ध हैं। इस प्रकार के मामले में, हम देखते हैं कि, संसद के सदस्यों की हैसियत से, जैसा कि वे जनता के प्रतिनिधि हैं, इस विधेयक को पारित करना, न तो उचित कार्यवाई
* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3112-13