हिंदू कोड-जारी - Page 557

542 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

होगी और न ही यह सरकार के हक में होगा। इसलिए, मेरा कहना है कि जब तक नए चुनाव नहीं हो जाते हैं, इस विधेयक को पारित नहीं करना चाहिए।

* श्री जांगडे : महोदय, मैं पिछले चार-पाँच दिनों से माननीय सदस्यों की दलीलें सुन चुका हूँ। उनके संभाषणों से मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस अनुच्छेद पर विचार नहीं किया गया है, परन्तु सामान्य चर्चा आरम्भ हो चुकी है।

मैं माननीय सदस्यों द्वारा विवाह व तलाक के इस विधेयक के विरुद्ध उठाई गई आपत्तियों को पुनः गिनवाना चाहता हूँ और मैं उनका उत्तर देना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ।

अभी-अभी श्री सी. डी. पाण्डे ने कहा था कि 90 प्रतिशत जनता में प्रचलित विवाह व तलाक के ढीले-ढाले रिवाजों को ऐसे ही छोड़ देना चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा था कि आदिवासी समुदाय को, जिनमें यह तलाक प्रथा नहीं अपनायी गई है, इसे अपनाने को बाध्य क्यों किया गया है।

पं. एम.बी. भार्गव : उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा।

श्री श्यामनंदन सहाय : ऐसा नहीं कहा गया था। आप उनके साथ अन्याय क्यों कर रहे हैं?

श्री जांगड़े : इन्होंने कहा था कि यह वैवाहिक अधिनियम, जो पारित होने जा रहा है, विवाह आदि प्रक्रिया को बहुत लम्बा कर देगा और ग्रामीण जनता के लिए अत्यधिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर देगा।

बाबू रामनारायण सिंह : वे केवल हमें धर्मोंपदेश देने आए थे। उन्होंने विशेषरूप से किसी भी धारा के संबंध में नहीं कहा है।

बाबू रामनारायण सिंह : आप इसी के लायक हैं।

श्री जांगड़े : मैं 90 प्रतिशत जनता के मध्य सामाजिक जागृति लाने के लिए कार्य कर रहा हूँ और मैं उन्हें भली-भाँति जानता हूँ। मैं उनके विवाह एवं तलाक संबंधी रीति-रिवाजों को बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ। जो लोग उनकी ओर से बोल रहे हैं वे उन्हें नहीं जानते हैं। वे केवल इस विधेयक को आगे बढ़ाने में बाधा डालने के लिए बोल रहे हैं। यह कहा गया हे कि सरलता से तलाक मिलना अधिक उचित बात है। महोदय, मैं बताना चाहता हूँ कि शूद्रों में तलाक प्रथा इतनी पुरानी और बेकार हो

* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3117-20