हिंदू कोड-जारी - Page 558

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गई है कि इसका गलत रूप से प्रयोग किया जाने लगा है। आज हमारी माताओं और बहनों का मान-सम्मान इसके कारण खतरे में पड़ गया है। वे कलकत्ता और बम्बई में बेची जाती हैं ओर उससे अन्य विश्वासों को ठेस पहुँचती है। आज शूद्रों में स्त्री का उतना भी आदर नहीं रह गया है जितना कि एक गाय का है। गाय तो केवल एक बार ही बेची जाती है परन्तु स्त्रियाँ कई बार बेची जाती हैं। अब उनमें प्रचलित यह रिवाज मनमानी प्रथा बन गया है और अब यह केवल गरीबों का ही रिवाज नहीं रहा है। आप कहते हैं कि यदि इस रिवाज को समाप्त कर दिया जाता है तो लोगों को निचली अदालत में अधिक व्यय करना पड़ेगा, परन्तु मैं डॉ. अम्बेडकर की इस बुद्धि मानी की प्रशंसा करने में सहायता नहीं करूँगा जिन्होंने उपाय सुझाया है कि जब तक सरकार की मंजूरी प्राप्त नहीं हो जाती है तब तक जाति के पंच का निर्णय बाध्यकारी नहीं होगा। आज हम क्या करते हैं केवल विवाह, सप्तपदी प्रथा को पूर्ण करना और दो या तीन दिन के पश्चात् पत्नी को बेच देना। लोग उसे बेचने और तलाक देने के लिए तैयार हो गए हैं। इस मामले में सप्तपदी और विवाह संस्कार का क्या अर्थ है। प्राचीन रीति-रिवाज तो अब सड़-गल गए हैं। आप उन्हें बरकरार रखना चाहते हैं। आप उन्हें हिंदू धर्म के नाम पर बनाए रखना चाहते हैं। पर मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि 90 फीसदी से अधिक हिंदू समाज के लोग अब इसका विरोध कर रहे हैं। किसी भी प्रकार से स्त्रियों का प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए। वे अत्यधिक कठिनाइयों में परिश्रम कर रही हैं। आपका कहना है कि हम उन्हें देवी और सौभाग्य लक्ष्मी जैसा आदर देते हैं, परन्तु सब आपके द्वारा प्रस्तुत किया झूठ है।

अभी-अभी कुछ आरणीय सदस्यों ने कहा कि वे आदिवासियों के लिए तलाक नहीं चाहते हैं और उन्हें ये अपनाने के लिए बाध्य क्यों किया जा रहा है। यह बहुत से सम्माननीय सदस्यों का मत है। आप शेर और गाय को एक ही श्रेणी में लाना चाहते हैं। क्या एक शिकारी और उसके शिकार को एक साथ रखा जा सकता है? क्या आप पूर्व व पश्चिम को मिलाना चाहते हैं। वे कभी इकट्ठे नहीं मिल सकते हैं। एक ओर आप कहते हैं कि आदिवासियों में तलाक होना ही नहीं चाहिए, और दूसरी ओर आप कहते हैं कि शूद्रों में तलाक प्रक्रिया सरल होनी चाहिए। यह विसंगति हमारी नैतिकता और मानवीय आदर्शों में आ रही गिरावट दर्शाती है। हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप, इस उच्चस्तरीय भेदभाव को दूर करने और आदिवासियों व शूद्रों को केप कमोरिन से सीधे कश्मीर तक एक साथ लाने के लिए तैयार किया गया था। आप हिंदुओं में जागृति फैलाना चाहते हैं। मैं कहता हूँ कि हिंदू कोड बिल इस दिशा में अत्यधिक सहायक सिद्ध होगा। आप नैतिक मूल्यों का वह समान भाव नहीं प्रकट करना चाहते हैं जो डॉ. अम्बेडकर ने इस बिल का प्रारूप बनाने में दर्शाया है। इस संबंध में मैं कहना चाहता हूँ कि यदि आदिवासियों और शूद्रों को एक साथ एकत्र करना कुछ अर्थ रखता है तो, यह केवल हिंदू कोड बिल द्वारा ही संभव होगा। आपका