हिंदू कोड-जारी - Page 559

544 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कहना है कि ये उन पर ही लागू होगा जो इसे मानना चाहेंगे, और जो इसे अपनाना नहीं चाहते हों उन्हें इसे अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा तथा किसी को भी एक विवाह करने या तलाक देने की प्रथा अपनाने के लिए जोर नहीं डाला जायेगा। मेरे विचार में इस संबंध में गलत ढंग से प्रचार किया गया है। सरकार के पास पैसा नहीं है और वह इससे संबंधित प्रचार नहीं करना चाहती है। हिंदू संहिता विधेयक के समर्थक नहीं, बल्कि इसके विरोधी जबर्दस्त प्रचार कर रहे हैं। एक बार मैंने सुना था करपात्री जी एक भाषण में कह रहे थे कि यह विधेयक पिता व पुत्री के बीच भी विवाह को संभव बना सकता है। इसी तरह अन्य अनर्गल प्रचार भी किए जा रहे हैं। यह कहा जाता है कि यह भाई-बहन में भी विवाह करा सकता है और हिंदू धर्म टुकड़ों-टुकड़ों में बिखर रहा है। मेरा कहना है कि हिंदू धर्म में बढ़ने वाली बीमारी को इलाज द्वारा ही ठीक किया जा सकेगा। यही हिंदू संहिता का उद्देश्य है। इस संबंध में ऐसा ही प्रचार किया जाना होगा। आप कहते हैं कि आप तलाक नहीं चाहते हैं परन्तु दूसरी ओर, आप चाहते हैं कि इसे हमारे लिए आरंभ किया जाना चाहिए। आदिवासियों में एक विवाहित स्त्री जो बाद में विधवा हो गई हो, वह किसी भी हाल में पुनःविवाह नहीं कर कर सकती है परन्तु पुरुष सैकड़ों बार इच्छानुसार विवाह कर सकते हैं। यह न्याय नहीं है। जैसे कि राम ने एक ही बार विवाह किया था....

माननीय उपाध्यक्ष : आप राम को तो एक तरफ छोड़ दें।

श्री भट्ट : उन्हें अनुमति दी जानी चाहिए।

श्री जांगड़े : मैं शूद्रों में प्रचलित बुरे रीति-रिवाजों के बारे में बात कर रहा था। हम इन्हें बदलना चाहते हैं। प्रत्येक पुरुष पाँच से छः स्त्रियों तक से विवाह कर सकता है। किसी भी घर स्त्रियाँ सप्तपदी के अनुसार विवाहित नहीं पाई गई हैं। वे पुरुषों की मनमानी से ले जाई जाती हैं। लगातार स्त्रियाँ बदलने से उनका खर्च भी अधिक होता है। उनकी आधी से अधिक संपत्ति इन स्त्रियों से विवाह करने पर खर्च हो जाती है। क्या एक विवाहित स्त्री का दूसरे पुरुष के पास रहना न्याय है? यह बिल जिसमें आप हिंदू धर्म की समाप्ति देखते हैं, इन बुराइयों को हटाने के लिए लाया गया है। इसलिए, बिना अधिक समय लिए मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि यदि आप हिंदू धर्म का पुनर्जागरण देखना चाहते हैं, यदि आप इसे बनाए रखना चाहते हैं और आदिवासियों व शूद्रों को एक करना चाहते हैं तो ‘हिंदू संहिता विधेयक’ के विवाह व तलाक अनुच्छेदों से संबंधित संशोधन को स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए।

* श्री टी.एन. सिंह : महोदय, मैं जानबूझकर हिंदी में ही बोल रहा हूँ, क्योंकि

* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3126-28