हिंदू कोड-जारी - Page 560

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कुछ माननीय सदस्यों और विशेषकर श्री ओरांव ने हिंदू संहिता विधेयक पर हिंदी में बोलते हुए, एक प्रकार से हमें हिंदी में ही बोलने की सलाह दी थी। हमारे मन में विशेषकर अनुच्छेद 4 पर चर्चा करते समय केवल एक ही विशेष बात है। डॉ. अम्बेडकर ने निश्चित रूप से मनु, पाराशर और याज्ञवल्क्य के मार्ग पर चलकर उनकी विशिष्ट मण्डली में सम्मिलित होने के प्रयास किए हैं, लेकिन मेरा विश्वास है कि यह उनकी ओर से अनुचित प्रयास है क्योंकि हमारी परमपराएँ समय की माँग एवं परिस्थितियों के अनुसार शनैः शनैः विकसित होती गई हैं। वे संयुक्त बुद्धिमानी व अनुभव के आधार पर बनी हैं। अतः, किसी भी विशेष व्यक्ति की बुद्धिमानी इनको प्रभावित नहीं कर सकती है। मेरे कहने का अर्थ है कि हम अपनी परम्पराओं को इतनी सरलता और सुगमता से तोड़ नहीं सकते हैं। यहाँ तक कि हम शायद इन सारी परम्पराओं को जानते तक नहीं हैं। मैं डॉ. अम्बेडकर हमारे कानून मंत्री को यह बताने के लिए चुनौती देना चाहूँगा कि हमारी कितनी परम्पराएँ इस विशाल भारत वर्ष में ऐसी हैं, जिन्हें वे इस हिंदू संहिता द्वारा पूर्ण रूप से समाप्त करना चाहते हैं। उनके लिए ऐसा कहना कहाँ तक उचित है कि ये परमपराएँ जिन्हें शायद वे नहीं जानते हैं, पूर्ण रूप से समाप्त कर दी जायेंगी? आप पाराशर व याज्ञवल्क्य अथवा अन्य स्मृतिकार के अनुगामी बनने के प्रयास कर सकते हैं, परन्तु भगवान के लिए इन परम्पराओं पर ऐसा प्रहार न करें।

महोदय, मैं आपको बताना चाहता हूँ हमारे देश के कोने-कोने में असंख्य लोगों द्वारा बहुत-सी उचित परम्पराएँ अपनाई जा रही हैं। वे शायद नैतिकता के उच्चतम स्तर तक, जो कि मनु, पाराशर और अन्य स्मृतिकारों द्वारा अपनाया गया था, अपनायी जा रही हैं। क्या आज कोई भी कह सकता है कि देश के उस वर्ग में, जिसमें श्री थेबले, ओरांव को परम्पराएँ, बहुत से कानून उतने उच्चतम स्तर के नहीं हैं जितने कि हमारे कानून हैं? मेरे विचार में यह तलाक (शायद हिंदी में इसके लिए कोई एक शब्द नहीं है)। (एक सम्माननीय सदस्यः विवाह-विच्छेद।) आप इसे विवाह-विच्छेद कह सकते हैं, लेकिन वैसे यह एक शब्द नहीं है, के संबंध में लागू नियम हमारी संहिता अथवा कहीं भी इंग्लैण्ड, अमरीका और कहीं और पाए गए नियमों से उच्चतर हैं।

हमारे विचार में उन्हें कम करना या यह बढ़ा-चढ़ा कर कहना कि यह संहिता या उपाय अधिक सही है और उसके स्थान पर इसे रखें, उचित नहीं होगा। इसीलिए, मैं हमारी सरकार, माननीय कानून मंत्री से प्रार्थना करता हूँ कि हमारे लिए यह अनुचित है, कि परमपराओं से अनभिज्ञ होने के कारण इन परम्पराओं पर इस प्रकार से विचार किया जाए। दूसरा, इन परम्पराओं को पूर्णरूपेण नष्ट करना उचित नहीं है जबकि वे किसी भी नियम और विधेयक विरुद्ध नहीं जाती हैं। मैंने सुना है कि