547
लेना चाहिए, और क्या रिवाजी कानून में, जैसा कि श्री जांगड़े का कथन था कि, सुधार लाना होगा, प्रत्येक व्यक्ति अनुचित रिवाजों में सुधार लाना चाहते हैं। अतः, हमें यह ज्ञान होना चाहिए कि इसे कैसे निर्धारित किया जायेगा।
श्री टी.एन. सिंह : श्री शुक्ल द्वारा पूछा गया प्रश्न तो बहुत ही साधारण-सा है। यह न तो आप हैं और न ही मैं हूँ जो परम्पराओं को सुधारना चाहते हैं। यह समय की माँग के अनुसार पूरे समाज, पूरे समुदाय द्वारा किया जाता है और ऐसा कभी नहीं कहा गया कि सभी परम्पराएँ अपरिवर्तित रहेंगी। सभी बदलाव के दौर से गुजरी हैं। लेकिन मेरा कहना है कि जब हम अपना व्यक्तिगत निर्णय किसी संयुक्त विवेक के विरोध में देते हैं तो यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम पहले उसका गहन अध्ययन करें। मुझे इतना ही कहना है। मैं यह नहीं कहता हूँ कि किसी भी रिवाज को नहीं बदला जाना चाहिए, लेकिन हमें उसको संयुक्त रूप से विवेक सहित बदलना होगा। इस प्रकार से हमें ऐसा करने का अधिकार है लेकिन यह हमें विधानमंडल द्वारा नहीं करना चाहिए। मैं यही कहना चाहता हूँ। श्री ए. सी. शुक्ल : कैसे?
श्री टी. एन. सिंह : बहुत-सी ऐसी परम्पराएँ हैं जिन्हें आप अनुचित मानते हैं जनता के विचारों के दबावानुसार बदल जाती हैं। बहुत-सी अन्य परम्पराएँ समय की माँग के अनुसार परिवर्तित हो जाती हैं। यह कहा गया है कि एक समय जब एक शिशु स्पार्टा में पैदा होता था, उसे बाहर फेंक दिया जाता था। यदि वह एक दिन और एक रात के पश्चात् जीवित रहता था, तो उसे वापिस ले आया जाता था और जीवन जीने का पूर्ण अधिकार दे दिया जाता था। यह सत्य है। उस समय ऐसी परम्परा की विशेष आवश्यकता थी। ये परम्पराएँ समय-समय पर समाज की आवश्यकता के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं।
डॉ. अम्बेडकर : आप एक अनुचित मसले पर तर्क-वितर्क कर रहे हैं।
श्री टी.एन. सिंह : मैं इसे समझा नहीं। जब मैं विश्वास करता हूँ कि आप व्यर्थ प्रयास कर रहे हैं, तो आप ने सोचा होगा कि मैं एक अनुचित मामले का समर्थन कर रहा हूँ। बात यह है कि आपको हमारी परम्पराओं का पूर्ण ज्ञान नहीं है। सिर्फ उनका पूर्णरूपेण अध्ययन करने के पश्चात् ही आप उन्हें बदल सकेंगे और वे परम्पराएँ जो सर्वथा सही हैं, वे या तो इस अधिनियम द्वारा जारी रखी जाती हैं अथवा नहीं रखी जातीं....
श्री ए.सी. शुक्ल : क्या उन्हें दर्ज कर लिया गया है?