हिंदू कोड-जारी - Page 563

548 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री टी.एन. सिंह : हम इस देश में रहते हैं और उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं। इसलिए इन सही परम्पराओं को तोड़ना अनुचित है और मैं चाहूँगा कि या तो यह अनुच्छेद पूरा हटा दिया जाए या फिर इसे अगले अनुच्छेद में समायोजित कर दिया जाए। उसके पश्चात् ही इस पर विचार किया जाना उचित होगा। इसे अभी तत्काल इसी प्रकार पारित करना उचित नहीं होगा।

* चौ. रणबीर सिंह (पंजाब) मैं पं. ठाकुर दास भार्गव द्वारा प्रस्तावित संशोधन नं. 420 और श्री भट्ट द्वारा प्रस्तावित नं. 288 संशोधन के पक्ष में खड़ा हुआ हूँ। अपने संशोधन द्वारा श्री भट्ट का कहना है कि यदि कुछ रीति-रिवाज और रस्में हिंदू संहिता विधेयक के साथ असंगत सिद्ध होती हैं, तब उसका इस प्रकार से समाधान नहीं किया जाना चाहिए कि रिवाज को ही समाप्त कर दिया जाए, बल्कि उसे दस वर्षों तक जारी रहने दिया जाना चाहिए जिसके पश्चात् इसे समाप्त मान लिया जाना चाहिए। संशोधन सं. 420 द्वारा पं. ठाकुर ठास भार्गव का कहना है कि जो रिवाज हिंदू संहिता विधेयक के अनुसार हैं उन्हें समाप्त कर दिया जाए; और जो रिवाज बन जाएँ, उनकी सत्ता और वैधता को मान लिया जाए। मेरे ज्ञानी मित्र श्री पाण्डे द्वारा जो भी कहा गया हो, मैं उससे सहमत हूँ। यह बात सही है और बहुत अधिक दिल बँधाने वाली है। हिंदू संहिता विधेयक का वास्तविक उद्देश्य यह समझा गया था कि यह विधेयक समाज में विद्यमान सामाजिक कुरीतियों को दूर कर उनमें कुछ परिवर्तन लायेगा और देश में कुछ सुधारों का आरंभ करने के लिए इसे लाया जाएगा। इस पर विचार किया जाना है कि विधेयक से कितने लोग प्रभावित होंगे और जैसा कि उन्होंने कहा कि मैं हिंदू संहिता विधेयक को परोक्ष रूप से देश के उन लोगों पर लागू करने का, जो अब तक शक्ति का दुरुपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं, सम्मान करता हूँ।

श्री ए.सी. शुक्ल : यहाँ तक कि वे इसे नहीं चाहते हैं उन्हें भी इसे अपनाना होगा।

चौ. रणबीर सिंह : श्री शुक्ल मेरे द्वारा बोले गए शब्द ‘लागू होना’ का अर्थ समझ नहीं पाए हैं, या फिर उन्होंने इसे ठीक प्रकार से सुना नहीं है। यदि वे यह कहते हैं कि लागू करना जो मैंने कहा था, गलत है तब शायद मैं उनसे जानना चाहूँगा कि क्या वे कोई ऐसा उदाहरण दे सकते हैं जब कि पंजाब के किसी व्यक्ति ने, चाहे वह हिंदू हो अथवा सिख हो या मुसलमान हो, कभी अपनी आवाज अपने रिवाजी कानूनों को समाप्त करने तथा उसके स्थान पर मनु या याज्ञवल्क्य अथवा किसी अन्य का कानून जारी करने के लिए उठाई हो।

* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3142-50