हिंदू कोड-जारी - Page 565

550 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ब्राह्मणवादी नियम नहीं मानती थी और वह यहाँ तक कि अब भी नहीं मानती है। मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि हमारे समाज में वास्तविक रूप से एक-विवाह प्रथा और तलाक दोनों प्रावधानों से संबंधित किसी भी प्रकार को अधिक विरोध की संभावना नहीं थी, और मैं वैयक्तिक रूप से उनके विरुद्ध नहीं हूँ, परन्तु मैं उस तरीके और प्रस्तुतिकरण का विरोध करता हूँ जिसका आप सहारा ले रहे हैं। और जिस प्रकार से लुका-छिपा कर यह तैयार किया गया है वह उचित नहीं है। ऐसा इसलिए नहीं हैं क्योंकि मैं अपने आप को गैर-हिंदू मानता हूँ परन्तु मैं अनुभव करता हूँ कि हम हिंदू संहिता द्वारा कभी भी शासित नहीं हुए हैं और यह हम पर कभी लागू नहीं किया गया है। मुझे आपकी इस धारणा पर, कि जिनको आप मानसिक रूप से वशीभूत नहीं कर सकते हैं उन्हें आप इस छिपी हुई नीति द्वारा शासित कर सकते हैं, संदेह है। मैं आपके नियमों और आदेशों से जो आप विवाह व तलाक के संबंध में प्रचलित रिवाजों को छोड़ते हुए जारी करने जा रहे हैं, बहुत अधिक असहमत हूँ। मैं सविनय निवेदन करना चाहता हूँ कि विधवाओं की दयनीय दशा के संबंध में हिंदू समाज में बहुत से सुधारकों ने बड़े-बड़े सुधार किए हैं लेकिन मैं इस बात की ओर इशारा करना चाहता हूँ कि अति प्राचीन काल से ही हमारे समाज में बाल-विधवा एक अनजान चीज रही है। हमारा समाज बाल-विधवा के नाम को नहीं जानता है। क्योंकि यह हमारे समाज का नियम है कि जब किसी स्त्री के पति का देहांत हो जाता है, तो उसकी मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् स्त्री के माता-पिता और उसकी ससुराल के रिश्तेदार एकत्रित होते हैं और उसके संकोच करने के बावजूद भी, जैसा कि हिंदू समाज में आम बात है, और उसकी औपचारिक इच्छा के विरुद्ध कि वह स्वयं ही जो विपदा उस पर आ पड़ी है उसे स्वयं झेलेगी, तथा उसके इनकार करने के पश्चात् भी उसे बताया जाता है कि यह संभव नहीं है। यह कहा जा सकता है कि उसके अच्छे आदर्श हैं, परन्तु यहाँ ऐसे कितने लोग हैं जो इस प्रकार के उच्च आदर्शों पर चलना चाहते हैं? हमारे समाज के लोग शंकित रहते हैं कि क्या ऐसा उच्च आदर्श जिसे आप हमारे समाज में स्थापित करने जा रहे हैं, हमारे समाज में कोई बुराई तो उत्पन्न नहीं करेगा। इसलिए आपको हमारी साधारण पुनर्विवाह प्रथा को मानना चाहिए और अवमानना नहीं करनी चाहिए। अतः मैं श्री भट्ट द्वारा रखे गए प्रस्ताव का समर्थन करना चाहता हूँ। अब मैं उसके लिए कारणों का उल्लेख करता हूँ।

एक ओर जहाँ पर आपके नियम और कानून हमारी स्त्री जाति की समस्याओं को कम करना चाहते हैं, और उन्होंने बहुत सीमा तक उन्हें कम भी कर दिया है, और दूसरी ओर उनकी समस्याएँ बहुविध रूप से बढ़ गई हैं। और यह इसलिए है क्योंकि आपने उन्हें जब वे चाहें, विवाह करने का अधिकार दे दिया है। सामान्य तौर