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कर लेती है तो उसके माता-पिता की तो दुर्गति हो जाती है और उस कन्या को भी अभियक्त ठहराया जाता है। हर कोई उसके पिता के सम्मुख आ कर कहता है, ‘‘आप अपनी कन्या का विवाह क्यों नहीं तय कर रहे हैं?’’ लड़की विवाह के लिए कितनी भी दुखीहो कर विरोध करे परन्तु वह उससे बच नहीं सकती है। उसे विवाह के लिए बाध्य किया जाता है; यह सिद्धांत उचित भी हो सकता है और अनुचित भी, परन्तु है यह सच। इस पूरे उदाहरण से आप शहरी जीवन और गाँव के जीवन जीने के तरीके में, अन्तर जान सकते हैं। उनमें कितना फर्क है इसे देख सकते हैं; और तब भी आप दोनों के लिए एक ही कानून लागू करना चाहते हैं। मेरे मित्र श्री जांगड़े ने कितने जोरदार शब्दों में बोला है। उन्होंने अन्य लोगों के लिए बोला है परन्तु मेरा संदेह है श्री जांगड़े अब शहरी व्यक्ति हो चुके हैं या वे उनके पक्ष में हो गए है। वे नागरी जीवन के ढंग की प्रशंसा कर रहे हैं। वे अपनी कहानी सुनाना चाहते हैं न कि अपने इलाके के लोगों की। इसीलिए मेरा निवेदन है कि जब दोनों प्रकार के जीवन जीने के तरीके में इतना अधिक विशाल अन्तर है, उनकी सामाजिक परिस्थितियों में अत्यधिक वैभिन्यता है और आप एक कानून जारी करना चाहते हैं जो कि उनके रीति-रिवाजों और रस्मों में इतनी अधिक असमानता के बावजूद सभी लोगों पर लागू किया जाएगा, यह उनके ऊपर बहुत बड़ा अन्याय होगा।
एक दूसरा तथ्य है जिसे मैं इस संबंध में उसे भी छूना चाहूँगा और जो सगोत्र विवाह से संबंधित है। पंजाब में हमारे अपनाए हुए रिवाज के प्रतिकूल यहाँ पर पाया गया है कि अधिकतर लड़कियाँ सामान्यतः स्थानीय तौर पर ही ब्याही जाती हैं। स्वयं दिल्ली की ही स्थिति लेते हुए, यह देखने को मिलेगा कि शहर के एक भाग में रहने वाली लड़कियाँ शहर के दूसरे इलाके में ब्याह दी गई हैं। यहाँ तक कि बहुत छोटे इलाके समझो 10 हजार की जनसंख्या वाले शहर में उनका इसी प्रकार से विवाह किया गया है। इन परिस्थितियों के अंतर्गत, वे हम लोगों में प्रचलित विवाह संबंध, रिवाजों से परिचित नहीं हैं। हममें प्रचलित रिवाजों को मानते हुए, मैं अपने पुत्र का विवाह अपनी स्वयं की उपजाति में नहीं कर सकता हूँ जो कि 10 मील की परिधि में बसे हुए 24 गाँवों तक में फैली हुई है। केवल यही नहीं है कि 24 गाँवों में ही उस का विवाह-संबंध निश्चित नहीं किया जा सकता है बल्कि 30 से 40 गांवों तक में जहाँ तक उसकी माँ की उपजाति के परिवार रहते हैं वे गाँव भी उसके वैवाहिक संबंधों के लिए निषिद्ध हैं। मैं अपने पुत्र का विवाह 30 से 40 तक के उन गाँवों की किसी भी कन्या से निश्चित नहीं कर सकता हूँ, जहाँ पर मेरी माँ की उपजाति के लोग रहते हैं। कहने का तात्पर्य है कि मैं आसपास के सौ गाँवों तक में अपने पुत्र के लिए बहू नहीं ढूँढ सकता हूँ।