42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(4) बशर्तें विशेष विवाह कानून, 1872 (1872 का ( III )) में कोई भी बात सम्मिलित हो, यह संहिता सभी हिंदुओं पर लागू होगी जिनका विवाह इस संहिता के प्रारम्भ होने से पहले इस कानून के प्रावधानों के अंतर्गत हुआ है।
मैं यह नहीं समझता कि यह संहिता केवल हिंदुओं के लिए ही क्यों बनाई जा रही है, अगर अधिकार दिए गए हैं : जैसा कि अनुच्छेद 25 के अंतर्गत दिए गए हैं ः कि ‘‘बशर्तें कि लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और इस भाग के दूसरे प्रावधान, सभी व्यक्तियों को समान रूप से धर्म के बारे में अंतःश्चेतना और प्रदर्शन करने, मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता का अधिकार है।’’ अगर यह अधिकार हिंदुओं और दूसरे धर्मों को मानने वालों को दिया गया है, मुझे कोई कारण समझ में नहीं आता कि हिंदुओं से, ऐसा विधेयक पारित करके जैसा कि हमारे सामने हैं, छीनने की कोशिश क्यों की जा रही है। मैं विधि मंत्री से पूछूँगा कि क्या वे संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर कब्जा नहीं कर रहे।
अनुच्छेद 25 के खंड (2) में कहा गया है कि :-
‘‘इस अनुच्छेद में ऐसा कुछ नहीं है जिस का प्रभाव वर्तमान कानून के परिचालन या राज्य को कानून बनाने रोकने पर होगा पर- (क) किसी में आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या दूसरी धर्मनिरपेक्ष जिसका सम्बन्ध धार्मिक क्रियाकलाप से हो, को संचालित करें या रोकें।
(ख) लोक मानस वाली हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए हिंदू धर्म के सभी वर्गों और श्रेणियों के लिए दिया गया है।
लेकिन अगर यह विधेयक का हिस्सा जिस पर चर्चा हो रही है समाज सुधार और जन कल्याण के एक साधन के रूप में बनाया जा रहा है, तो मुझे समझ नहीं आता यह विशेष धर्म के मानने वालों तक ही क्यों सीमित होना चाहिए और सभी के लिए क्यों न बने।
श्री राज बहादुर : महोदय, क्या मैं व्यवस्था का एक प्रश्न उठा सकता हूँ।
इस सदन के तीन या चार माननीय सदस्यों ने यह प्रश्न उठाया है कि विधेयक के इस हिस्से का विस्तार भारत के सभी नागरिकों पर किया जाना चाहिए। वास्तव में विधेयक की प्रथम प्रस्तुति के समय से सदन इस सिद्धांत पर वचनबद्ध है कि यह विधेयक केवल हिंदुओं पर लागू होगा। इस सिद्धांत के स्वीकार किए जाने के बाद क्या यह अब सदस्यों के लिए छूट है कि यह मुद्दा फिर से नए रूप में लें?