खंड 2 : (संहिता का प्रयोग) - Page 58

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माननीय अध्यक्ष : व्यवहारिक रूप में व्यवस्था का प्रश्न इस प्रकार है- मैं इसे अपनी तरह कह रहा हूँ। संक्षेप में कहें तो क्या कुछ संशोधनों को जिनका इस संहिता में प्रयोग इस विधेयक में दिए गए समुदायों से भिन्न समुदायों तक बढ़ाने की कोशिश में हो रहा है। यह विधेयक क्षेत्र के विस्तार में समान नहीं है : क्या यह भी मुद्दा है?

श्री राज बहादुर : सदन इस पर सहमत है कि इस संहिता को भारतीयों के कुछ वर्ग पर ही लागू किया जाए। क्या हम अब एक नया निर्णय करेंगे कि यह सभी पर लागू हो?

माननीय अध्यक्ष : यह तो एक ही बात है। विरोध इस पर है कि विधेयक का क्षेत्र अब बढ़ाया जा रहा है : यह विरोध का मुद्दा है। व्यक्तिगतरूप से मुझे स्वयं भी कुछ संशोधनों को या उनकी प्रविष्टियों के बारे में संदेह हो रहा था जिनको अब प्रस्तावित किया गया और जो प्रत्यक्षरूप से इस विधेयक के क्षेत्र के विस्तार के बारे में हैं लेकिन मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका। मुझे पहले सदस्यों को सुनना चाहिए तब अंत में निश्चय करना चाहिए कि मैं इस संशोधन के पक्ष में वोट दूँ या विपक्ष में।

डॉ. पी. एस. देशमुख : यह सदन पर है कि वह इस विधेयक को क्षेत्र का विस्तार करे या सीमित करे। अभी तक कोई विशेष खंड सदन द्वारा पारित नहीं किया गया, इसे करने की उसे पूर्ण स्वतंत्रता है। मान लो मूल विधेयक कहता है कि संहिता समस्त भारत पर लागू होगी और सदन किसी संशोधन का सुझाव देता है जिसके द्वारा कुछ राज्यों को निकाल दिया या उल्टा कर दिया जाए? मैं समझता हूँ कि सदन ऐसा करने के लिए पूर्ण सक्षम है।

माननीय अध्यक्ष महोदय : विधेयक का पूरे भारत के लिए विस्तार और फिर इसको भारत के कुछ भागों तक सीमित करना, इस विधेयक के सिद्धांतों का विस्तार नहीं होगा। कानून के सिद्धांत यथार्थ में कुछ कानून ही हैं, जिनका विस्तार कुछ भू-भाग तक ही नहीं बल्कि दूसरी तरह होता है। यह प्रथम दृष्टि में पूर्णरूप से सक्षम है, लेकिन मुद्दा यह है कि क्या यह अब यह कहने के लिए कि यह ईसाईयों, मुसलमानों, पारसियों और यहूदियों पर भी लागू होना सक्षम है।

श्री श्यामानन्दन सहाय : मैं यहाँ दो बातें कहना चाहूँगा। इसके पहले कि आप नियम बनाएँ मैं प्रार्थना करूंगा हमें थोड़ा मौका दिया जाए।

माननीय अध्यक्ष : मैं सदस्यों को मौका दूँगा।

4 बजे सायं