हिंदू कोड-जारी - Page 571

556 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उसके किसी एक भाई के हिस्से पर अनधिकार हस्तक्षेप द्वारा ही हो सकती हैं। एक-विवाह प्रथा के अतर्गत, तुलनात्मक रूप से पत्नियों को अधिक संख्या में पति प्राप्त होंगे जो किसी अन्य प्रथा द्वारा संभव नहीं था। यह इसीलिए संभव है जब इस देश में ऐसे क्षेत्र भी हों जहाँ स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक है। सरदार बी. एस. मान (पंजाब) : मद्रास में है।

चौ. रणबीर सिंह : परन्तु दुविधा यह है कि हमारी तरफ के हिंदू जाट इतने खुले विचार वाले नहीं हैं जो कि सुदूर मद्रास तक जाएँ, एक सिख जाट जा सकता है। मेरी अपनी मान्यता है कि एक-विवाह प्रथा इस दिशा में सही कदम है परन्तु परेशानी यह है कि हमारा समाज अभी इतना विकसित नहीं हुआ है, अथवा मैं कहना चाहूँगा, भ्रष्ट नहीं हुआ है कि वह सगोत्र विवाह की स्वीकृति देने के लिए मान जाए। इसके अगले दस वर्षों के लिए स्थगित कर देना चाहिए, उसके पश्चात् इसे नए प्रस्ताव के रूप में विचारार्थ लेना चाहिए। यदि उस समय तक समाज विकास की चरम-सीमा तक पहुँचने में सफल हो गया होगा, जो ऐसा कदम उठाने के लिए स्वच्छ माहौल देगा, तो हम इसे स्वीकार कर लेंगे; अन्यथा हम इसे लंबित ही रखेंगे। हम यद्यपि अपने समाज में जिसे हम बलात् रूप से किया गया दूसरा विवाह कहते हैं उसको चालू रखने की स्वीकृति नहीं देंगे, तथापि यह प्रथा इतनी आम नहीं है। हमें दस वर्ष का समय दें जिसके दौरान हम इस रिवाज को समाप्त करने के प्रयास करेंगे।

अंत में मैं पुनः माननीय डॉ. अम्बेडकर के समक्ष यह निवेदन करने का सुअवसर लेता हूँ कि यद्यपि मैं तहे-दिल से इस प्रस्ताव से सहमत हूँ, फिर भी मैं उनका श्री भट्ट के संशोधन या श्री भार्गव द्वारा रखे गए संशोधन सं. 420 को स्वीकृति देना पसंद करूँगा।

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कप्तान ए. पी. सिंह (विंध्य प्रदेश) : नहीं श्रीमान्, जिन सदस्यों ने यह संशोधन का प्रस्ताव रखा है, कम से कम उन्हें तो बोलने का मौका देना ही चाहिए।

सरदार बी. एस. मान : जी हाँ, श्रीमान्। यह अति महत्वपूर्ण मुद्दा है।

माननीय उपाध्यक्ष : मैं पहले श्री झुनझुनवाला को आमंत्रित करूँगा और उनके बाद श्री भट्ट को। उन्होंने संशोधनों को तालिकाबद्ध किया है।

श्री श्यामनंदन सहाय : श्रीमान्, मैंने भी संशोधनों का प्रस्ताव रखा था।

माननीय उपाध्यक्ष : मैं उन्हें इसी क्रम से बुलाऊँगा, और फिर मैं किसी अन्य का नाम सोचूँगा।