हिंदू कोड-जारी - Page 572

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* श्री झुनझुनवाला (बिहार) : मेरे तीनों संशोधन संविधान के अनुरूप हैं। मेरा प्रथम संशोधन प्रबंध करता है कि यदि यह ‘अधिनियम’ किसी भी धर्म के विरुद्ध जाता है तो, इस विधेयक का कोई भी अनुच्छेद विद्यमान कानून के प्रावधानों को रद्द कर देगा; दूसरा संशोधन है कि इस ‘अधिनियम’ में यदि नैतिकता के विरुद्ध कुछ भी है, तो विधेयक किसी भी विद्यमान कानून के प्रावधान अथवा किसी भी प्रथा या चालू रस्म को रद्द नहीं करेगा अथवा तीसरा संशोधन है कि यदि इस अधिनियम में किसी समुदाय विशेष के लोगों की संस्कृति के विरुद्ध कुछ भी जायेगा तो, विधेयक विद्यमान कानून को रद्द नहीं करेगा।

श्रीमान्, जब मैंने तीसरे संशोधन का प्रस्ताव रखा था तो आपने पूछा था कि ‘संस्कृति’ शब्द की रचना और परिभाषा क्या होगी। इस संबंध में, कल, मैंने गलती से संविधान के अनुच्छेद 129 को, जो लोगों के प्रत्येक समुदाय को अपनी संस्कृति बनाए रखने की और उसका संरक्षण करने का अधिकार देता है, उद्धृत किया था। वास्तव में, यह अनुच्छेद 29 था न कि अनुच्छेद 129 था- जिसमें लिखा हैः-

‘‘29. (1) भारत के क्षेत्र में अथवा किसी भाग में रहने वाले किसी भी समुदाय के नागरिकों को, जिनकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या अपनी संस्कृति है, उसके संरक्षण का अधिकार होगा।

इसलिए ही मैंने ‘संस्कृति’ शब्द यहाँ पर प्रयुक्त किया है। संविधान के साथ अनुरूपता रखते हुए हिंदू संहिता ऐसा कुछ भी नियम नहीं बना सकता जिससे किसी भी समुदाय या वर्ग के लोगों को अपने धर्म या संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के अधिकार से वंचित, किया जा सके। मैं अपने द्वारा रखे गए संशोधनों को बाद में उठाऊंगा। यहाँ पर पुनः यह दोहराना चाहिए कि आपने ऐसा नियम निर्धारित किया है जिससे कि कोई भी अपने संशोधनों के संबंध में चर्चा करते समय अन्य संशोधनों अथवा धाराओं से संबंधित चर्चा करने का सुअवसर प्राप्त कर सकता है, अन्यथा बाद में उसे बोलने का मौका नहीं दिया जाएगा। इसी कारण से मेरा उद्देश्य इस धारा को पहले तथा संशोधनों को बाद में लेना है। साथ ही साथ यह मेरे लिए भी अधिक सुविधाजनक रहेगा।

श्रीमान, जब हिंदू संहिता विधेयक जो अब दूसरे शीर्षक ‘विवाह व तलाक विधेयक’ के नाम से पारित किया जाना है, तो इसके दो प्रमुख उद्देश्यों को ध्यान में रखते

* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3168-88