560 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री झुनझुनवाला : महोदय क्या मैं आपको यह स्पष्ट कर सकता हूँ कि ये विषय वास्तविक मसले से कैसे संबंधित हैं। प्रारम्भ में मैंने कहा था कि माननीय कानून मंत्री ने इस मूल्यांकन के समर्थन में दो मुख्य बिंदु दिए है। प्रथमतः उन्होंने इस विधेयक को एक प्रगतिवादी उपाय बताया है और द्वितीय उन्होंने कहा है कि स्त्रियों को, जिन्हें समान अधिकार नहीं मिले हैं, पुरुषों के समान लाने की आवश्यकता है। और अब यह धारा 4 प्रबंध करती है कि विधेयक के प्रावधान अन्य सभी मसलों को रद्द कर देंगे। जैसा मैंने पूर्व में कहा, मैं प्रथमतः इस धारा को रखूँगा। मेरे विचार में इस युक्ति की स्वयं की कोई उपयोगिता नहीं है यदि यह दोनों में से किसी भी उद्देश्य को पूरा नहीं करती है जो इसके समर्थन में प्रस्तुत किए गए हैं। अतः मैं केवल कानून मंत्री को समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि जो सुझाव उन्होंने सदन के समक्ष प्रस्तुत किया है, पूर्णतया अर्थहीन हैं और उन दो उद्देश्यों को पूर्ण नहीं करता है, जिसको उन्होंने समर्थित किया है। यथार्थतः इस सुझाव को किसी तरह से लाया जाना ही नहीं चाहिए था। यह वह तथ्य है जिसे मैं सदन को बताना चाहता था। श्रीमान आपकी आज्ञा से, इस संबंध में मैं, कुछ और टीका-टिप्पणी करना चाहता हूँ, और उससे पूरी बात स्पष्ट हो जायेगी, अन्यथा इसके बिना तर्क-वितर्क स्वयं ही अर्थहीन हो जायेगा। इसलिए मैं इस तथ्य को समझता हूँ कि यह संशोधन न तो प्रगतिवादी है और न ही यह स्त्रियों को उनके वे अधिकार दिलाता प्रतीत होता है जिनका तब समर्थन किया गया था जब यह विधेयक सदन में लाया गया था। यदि सम्पत्ति से संबंधित धारा ली जाएगी तो मुझे यह समझ में आता है क्योंकि जहाँ तक सम्पत्ति का सम्बन्ध है, हमारी स्त्रियों को इसी कारण समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं, उन्होंने इस कारण से अत्यधिक कठिनाइयाँ झेली हैं और वे अनगणित अत्याचार सहती रही हैं। मैं क्षमाप्रार्थी हूँ, श्रीमती दुर्गाबाई इस समय यहाँ उपस्थित नहीं हैं; वे कुछ दिल-दहलाने वाली मद्रास की स्त्रियों की घटनाएँ भली प्रकार से सुनातीं जिससे यहाँ हम सबको अधिक क्षोभ होता। सम्पत्ति की धारा का प्रश्न उठाने पर उस पर समग्रता में विचार करना होगा। यदि कानून मंत्री वास्तविक तौर पर हमारी स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए गम्भीर हो गए होते तो उन्हें सम्पत्ति की धारा को पहले लेना चाहिए था, क्योंकि हम तब तक स्त्रियों को समाज में उचित स्थान दिलाने के लिए संभावित रूप से मदद नहीं कर सकते हैं जब तक कि उनकी आर्थिक दशा उचित प्रकार से सुधर नहीं जाती है और उस परिधि में वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं हो जाती हैं। अतः मैं समझ नहीं सका हूँ कि इस धारा को पहले क्यों नहीं लिया गया है। उनके उद्देश्य की आलोचना करने का मेरा कोई इरादा नहीं है, लेकिन मैं ऐसा कर नहीं सकता हूँ परन्तु मेरा कहना है कि उनका वास्तविक प्रयोजन पूर्णरूपेण उससे भिन्न है जिसकी वे वकालत कर