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है, जो ऐसे ही मान लिए गए हैं और जो लोकनीति से प्रतिकूल नहीं हैं और चूँकि जिन्हें कानून का बल मिला है, उनको अनुमति देनी चाहिए। उस संबंध में मैं कहना चाहता हूँ कि रिवाजों का विस्तारपूर्वक उल्लेख करना सदस्यों के पूर्णतया अधिकार-क्षेत्र में है।
माननीय अध्यक्ष : यह पहले ही निर्धारित किया जा चुका है कि जहाँ तक विशिष्ट रीति-रिवाजों का संबंध है, उन्हें तभी लेना चाहिए जब विशिष्ट धाराओं पर चर्चा चल रही हो। जहाँ तक सामान्य धारा की प्रासंगिकता का संबंध है, आप सामान्य तौर पर चर्चा कर सकते हैं और कहें कि फलां-फलां एक रिवाज अति प्राचीन है और इसका एकरूपता से निरीक्षण किया गया है। आप किसी रीति-रिवाज की स्थिति के बारे में बहुत कुछ कह सके हैं, परन्तु यदि हमें सारे रिवाज लेने हों और उन पर चर्चा करनी हो तो उसका कोई अंत ही नहीं होगा। उसमें संगत धाराएँ भी हैं और जब उन्हें लिया जाए तो प्रत्येक विशिष्ट रिवाज पर चर्चा की जा सकती है। वही उचित रहेगा। मैं इस चर्चा को रोक नहीं रहा हूँ। मैं माननीय सदस्य से केवल अनुरोध करता हूँ और उनको मेरा सुझाव है कि वह समय अधिक उचित होगा। यहाँ वे सामान्य तौर पर चर्चा कर सकते हैं।
श्री झुनझुनवाला : श्रीमान, मैं आपके नियमानुसार ही बोलूँगा। लेकिन मैं निवेदन करता चाहता हूँ कि मुझे धारा 2 पर बोलने का अवसर नहीं दिया गया था, यद्यपि आदरणीय अध्यक्ष़्ा महोदय ने नियम बनाया था जैसा कि धारा 2 के विषय में भी बनाया था कि जब धारा 4 पर चर्चा की जायेगी तो सदस्य व्यवहारिक तौर पर सभी विषयों पर बोल सकेंगे। केवल सम्पत्ति से सम्बन्धित धारा पर चर्चा नहीं की जायेगी। मैं सदन को तलाक एवं विवाह से संबंधित व्यवस्था के लाभ-हानि के बारे में बता रहा हूँ। मैं सोचता हूँ मैंने कभी भी असंगत बात नहीं की। चलो कोई नहीं, अब मैं आपके नियमों का पालन करूँगा और अपने विचारों को संक्षेप में प्रस्तुत करूँगा। अब मैं अपने संशोधनों पर आता हूँ। बाबू रामनारायण सिंह : बहुत अच्छा।
डॉ. अम्बेडकर : अब आप बैठ जाइये।
श्री झुनझुनवाला : मैं बैठ जाऊँगा, आप कृपया इस अधिनियम को वापिस लेकर हिंदू समाज को इससे मुक्त करें।
डॉ. अम्बेडकर : कृपया बैठ जाएँ।
श्री झुनझुनवाला : आप छोड़ दें और मैं बैठ जाऊँगा।