हिंदू कोड-जारी - Page 581

566 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रस्तुत करने से पूर्व ही मुझे विश्वास दिला दिया होता कि वह प्रक्रिया इस-इस प्रकार से प्रगतिवादी है तो मैं समझ सकता था। उन्होंने तो केवल इतना ही कहा कि यह प्रगतिवादी है और स्त्रियों को समान अधिकार मिलने चाहिए। उन्होंने उनके लिए उन अधिकारों को नहीं स्वीकारा जिसकी उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता थी और जो उनके लिए अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हो सकते थे। जो अधिकार वे दे रहे हैं, वह है तलाक। इसलिए, मैं दिखाना चाह रहा था कि क्या ये वास्तव में प्रगतिवादी हैं। मैं कहता हूँ कि यह कभी प्रगतिवादी हो ही नहीं सकता। यदि कोई व्यक्ति कुछ गलत कार्य करता है तो यह उचित नहीं है कि उस कारण मैं भी वही गलती दोहराऊँ। दूसरी ओर, ऐसा विधान बनाया जाना चाहिए जिसमें एक व्यक्ति गलती करता है तो उसे निषिद्ध कर दिया जाए जिससे कि वह भविष्य में दुबारा न करें। यह नहीं होना चाहिए कि दूसरे व्यक्ति को उसे अपनाने को कहा जाए।

यह इस धारा के संबंध में था। अब मैं अपने संशोधनों की ओर आता हूँ और उन पर मैं अपने विचार पूर्ण तौर पर प्रस्तुत करूँगा। मैं उन्हें पहले ही पढ़ चुका हूँ अतः मैं उन्हें पुनः नहीं दोहराऊँगा जिससे अधिक समय लगे।

श्री श्यामनंदन सहाय : हम उन्हें कैसे समझेंगे और उन्हें वोट देंगे।

माननीय अध्यक्ष : क्या उन्होंने पहले ही पढ़ लिया है।

श्री झुनझुनवाला : जी हाँ श्रीमान्, मैं उन्हें पढ़ चुका हूँ।

माननीय अध्यक्ष : तब तो फिर उन्हें पुनः पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है।

श्री श्यामनंदन सहाय : हमें उन पर वोट देना है। आप उन्हें अवश्य पढं़े।

श्री झुनझुनवाला : मेरा प्रथम संशोधन है कि यदि कोई अधिनियम हिंदू, सिख, जैन या बुद्ध धर्म के विरुद्ध है अथवा मरूमक्कट्टयम और अलियासंतानम् नियमों के विरुद्ध है तो इसे उन पर लागू नहीं करना चाहिए।

डॉ. अम्बेडकर : इसे सिर्फ मारवाडि़यों पर ही लागू करना चाहिए।

श्री झुनझुनवाला : क्या यह मारवाडि़यों पर लागू नहीं किया गया था जब तक कि मैं बैठ नहीं गया था। यह अधिनियम भयंकर रूप से समाज और देश के लिए हानिकारक है।

माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य वक्तव्य जारी रखें।

श्री झुनझुनवाला : माननीय मंत्री विघ्न डाल रहे हैं और बदनाम कर रहे हैं।