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हमारे संविधान ने समान अधिकार दिए हैं। आप मुझे उनकी टिप्पणी का उत्तर क्यों नहीं देने दे रहे हैं?
माननीय अध्यक्ष : मैं उनसे बाधा डालने के लिए मना कर रहा हूँ। माननीय सदस्य जारी रखें।
श्री झुनझुनवाला : आप उनकी ओर देख कर कहें जिससे वे सुन सकें।
माननीय अध्यक्ष : मैंने माननीय मंत्री की यह आदत अपना ली है। मैं सम्मानीय मंत्री से विघ्न नहीं डालने के लिए कहना चाहूँगा।
श्री झुनझुनवाला : इस संबंध में, सदन के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 25 को पढ़ना चाहूँगा। मैं माननीय सदस्यों से ध्यानपूर्वक सुनने का अनुरोध करता हूँ।
‘‘25. (1) जन आदेश, नैतिकता और स्वास्थ्य एवं इस खंड के अन्य प्रावधानों के अधीन, सभी व्यक्ति समान रूप से अपने विवेक के अनुसार स्वतंत्रता तथा धर्म के स्वतंत्र रूप से मानने एवं प्रचार के अधिकारी हैं।
(2) इस अनुच्छेद में ऐसा कुछ नहीं है जो विद्यमान कानून के कार्यान्वयन पर प्रभाव डालेगा अथवा राज्य पर कोई भी कानून बनाने से रोक लगाएगा-
(क) किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य धर्मनिर्पेक्ष कार्यकलाप जो धार्मिक कार्यों से जुड़े हुए हो, उनको नियमित या प्रतिबंधित करेगा’’।
बाबू रामनारायण सिंह : कृपया इसका हिंदी में अनुवाद करें।
श्री झुनझुनवाला : आप उसके लिए एक अध्यापक तैनात करें। तत्पश्चात् हैः
‘‘(ख) हिंदुओं की सभी जातियों और वर्गों के लिए समाज कल्याण और सुधार अथवा सार्वजनिक आचरण के हिंदू धर्म के संस्थानों को जनता के लिए खोलने के लिए प्रबंध किए जा सकते हैं।’’
उसके पश्चात् स्पष्टीकरण दिया हुआ है जिसे पढ़ना आवश्यक नहीं है। अतः मैं अध्यक्ष महोदय एवं सदन के माननीय सदस्यों से निवेदन करता हूँ कि मेरे संशोधनों का उद्देश्य यह है कि जब भी आप सुधार लाने के प्रयास करना चाहें, तो आपको हमारे धर्मशास्त्रों को छेड़ने का अधिकार नहीं है। परन्तु आप ऐसी कोई भी प्रक्रिया यदि वह हमारे शास्त्र और धर्म विरुद्ध नहीं है तो उसे अपना सकते हैं। मेरा संशोधन इससे संबंधित है कि :
‘‘हिंदू कानून के किसी ग्रन्थ, नियम का टीका, अथवा इस अधिनियम के लागू होने से पूर्व तात्कालिक लागू कोई भी रिवाज या प्रथा अथवा अन्य कानून इस