570 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि ग्रंथों पर विचार नहीं किया जायेगा। यह एक अति महत्व का प्राथमिक विषय है। यह दूसरी बात होगी अगर हम क्रिया-विधिक के संबंध में धाराओं पर चर्चा करते हैं जैसे विवाह एवं तलाक के लिए धाराएँ निर्धारित करते हुए। आप इसे बंद कर सकते हैं अथवा शीघ्रता से इसे स्वीकार कर सकते हैं। परन्तु, यदि ग्रंथों को छोड़ दिया जाए, रीति-रिवाजों को त्याग दिया जाए जैसे प्रश्न, एक बड़े मसले हैं। अतः, मैं पुनः अत्यधिक आदर सहित यह निवेदन करूँगा। यदि आप इस विधेयक को आज ही पूर्ण करने जा रहे हैं और अधिनियम पारित किया जा रहा है, तब यह दूसरी बात है और हम इस चर्चा को समाप्त कर देंगे। यह कोई मुद्दा नहीं है और इसलिए, हम संशोधन प्रस्तुतकर्ताओं को समय दिया जाना चाहिए।
माननीय अध्यक्ष : वह आप कैसे कह सकते हैं?
श्री श्यामनंदन सहाय : हमें 55 धाराओं को पारित करने के लिए चर्चा हेतु लेना है। जहाँ तक इस धारा का संबंध है, आपको विचार-विमर्श के लिए कुछ और समय देना चाहिए। मेरे विचार से इस विषय में मेरे पक्ष में बहुत से सदस्यों की राय शामिल है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : क्या मैं नम्र निवेदन कर सकता हूँ श्रीमान, कि कभी-कभी जब इस सदन में अधिकतर सदस्यों द्वारा संशोधन प्रस्तुत किए जाते हैं और प्रस्तुतकर्ता का मुख्य ध्येय बोलने का मौका प्राप्त करना होता है तब स्थिति इसके बिलकुल भिन्न हो जाती है। जब, एक विधेयक पर विशेष प्रकार के संशोधन दिए जाते हैं, तब मेरा आपसे सविनय निवेदन है कि कृपया यह देख लें क्या संशोधन विषय -वस्तु में से ही एक है। तत्पश्चात्, संशोधनों के प्रस्तुतकर्ता को सामान्य रूप से बोलने का सुअवसर प्रदान करना चाहिए।
श्री भारती : यह सभाध्यक्ष के स्वनिर्णय पर छोड़ देना चाहिए।
पंडित मालवीय (उत्तर प्रदेश) : अभी भी बहुत से ऐसे लोग बचे हुए हैं, जो इस मसले पर बोलना चाहते हैं, और यद्यपि सदन को इसे पारित कर देना चाहिए, मैं अनुभव करता हूँ कि इस प्रकृति के मुद्दे में, हम कम से कम इतना तो कर सके हैं कि उन्हें सुन लें और फिर ही किसी निर्णय पर पहुँचें। अतः मैं महसूस करता हूँ कि हमें लोगों को बोलने का एक अवसर प्रदान करना चाहिए। और वास्तव में, यदि ऐसा अवसर दिया जाता है तो, मैं स्वयं भी इस धारा पर कुछ बोलना चाहूँगा। मुझे आशा है महोदय, हमें भी कम से कम अपनी बात कहने का मौका तो मिलेगा। हो सकता है सदन हमारे विचारों से सहमत हो; परन्तु मैं महसूस करता हूँ कि यदि हमें अपनी बात कहने तक का एक मौका नहीं मिलता है तो यह एक जुल्म होगा।