576 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री श्यामनंदन सहाय : यदि मैं गलती नहीं कर रहा हूँ तो इंग्लैंड में जनसामान्य कानून अभी भी प्रचलित हैं जबकि वर्षों से वहाँ पर एक संसद है।
डॉ. अम्बेडकर : मैं जानता हूँ उन्हें विशेष विषयों पर मुझसे अधिक जानकारी प्राप्त है।
श्री श्यामनंदन सहाय : डॉ. अम्बेडकर, मैंने कभी भी यह नहीं माना कि आप सर्वज्ञ हैं और आपको पूर्ण ज्ञान प्राप्त है। ऐसा संभव हो सकता है कि कुछ विशेष मुद्दों पर मुझे अधिक जानकारी हो....
डॉ. अम्बेडकर : मैं मानता हूँ आपको है। मेरा विषय है कि तथ्यों पर दृष्टि डालते हुए....
श्री भट्ट : मैं डॉ. अम्बेडकर को याद दिलाना चाहूँगा कि ‘परिषद’ शब्द हमने कहाँ से पाया है और ‘राज्य-परिषद्’ शब्द कैसे अस्तित्व में आया है।
डॉ. अम्बेडकर : वह परिषद् दूसरी बात है।
श्री भट्ट : वह कुछ नहीं था बल्कि परिषद् का ही एक प्रकार था।
डॉ. अम्बेडकर : ‘परिषद’ तो केवल एक समिति होती है; यह संसद नहीं होती है, यह कभी भी नहीं रही है। अपने स्वयं के बनाए रीति-रिवाजों को छोड़कर लोगों के पास अपने जीवन को नियमित करने के लिए और कौन-सा दूसरा मार्ग खुला हुआ था, क्योंकि न तो वहाँ कोई संसद थी, न कोई विधानमंडल था और न ही इस प्रकार का कुछ और था? परन्तु जब हमें संसद प्राप्त हो गई जिसका कार्य कानून बनाना है, तो प्रश्न है कि जिस पर हमें विचार करना और अत्यधिक गंभीरतापूर्ण विचार करना है कि क्या हम संसद से बाहर के लोगों को समानांतर प्राधिकरण बनाने की अनुमति देने जा रहे हैं जिससे वे अपने रिवाजी कानून बना सकें और संसद को उन्हें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। मेरे विचार में, यह अति गंभीर प्रश्न है जिस पर हमें विचार करना है। यह कहने के लिए केवल एक ही बात है कि जहाँ रिवाज विकसित हुए हैं और वे रिवाज इस प्रकार से वैध रीति-रिवाज हैं जैसे इस विधेयक की धारा 2 में वैध-रिवाज पारिभाषित किए गए हैं, उन्हें बनाए रखना चाहिए। वह बिल्कुल भिन्न प्रश्न है। बल्कि कहें कि रिवाज को कहीं भी बदलना, संशोधन करना, परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए, यह वास्तव में संसद के प्राधिकार को निराकृत करना है और मुझे काफी संशय है कि संसद द्वारा ऐसी किसी व्यवस्था को स्वीकृति दी जायेगी और वह मामला, जिसके बारे में मुझे निश्चित तौर पर संशय है, और मैं आगे भी कहता हूँ कि क्या संसद को उस