हिंदू कोड-जारी - Page 593

578 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री श्यामनंदन सहाय : आपके द्वारा प्रस्तुत करने से पूर्व अध्यक्ष महोदय मैं निवेदन करता हूँ कि पहले ही 1-15 हो गए हैं। जैसा मैंने कहा था कि यह एक विस्तृत धारा है जिसमें ग्रंथों, रीति-रिवाजों और प्रथाओं का प्रचलन समाप्त कर दिया है। इसीलिए हमारी इच्छा इसको उन संशोधनों में अलग-अलग करने की है जो प्रस्तावित किए गए हैं। इसमें बहुत अधिक समय लगेगा। अतः, मैं निवेदन करता हूँ कि वास्तविक प्रस्ताव दूसरे किसी भी दिन रखा जाए। कुछ सम्माननीय सदस्य : नहीं, नहीं।

डॉ. अम्बेडकर : इसमें पाँच मिनट से अधिक समय नहीं लगेगा। कुछ सम्माननीय सदस्य : नहीं, नहीं।

कैप्टन ए.पी. सिंह : इसमें इतने अधिक संशोधन है; ये चार घंटे लेंगे। (रुकावट)

माननीय उपाध्यक्ष : शांति! शांति! ऐसा किसलिए किया जा रहा है....

श्री सोढ़ी (पंजाब) : इसमें खण्ड बनाए जा सकते हैं, महोदय।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : प्रत्येक चरण में हमने खंड बनाने के लिए पूछा है। हम न्याय के सहारे चलना चाहते हैं न कि मनमाने नियमों के अनुसार।

माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य यह सुनिश्चित कर लें कि न्याय ही दिया जायेगा। परन्तु, प्रश्न है कि सदन ने समाप्ति स्वीकार की है; तर्क-वितर्क पूर्ण हो गया है; सम्माननीय कानून मंत्री उत्तर दे चुके हैं।

पण्डित मालवीय : सदन तब भी समाप्ति स्वीकार कर लेता यदि आपसे बहस छिड़ने के पश्चात् पाँच मिनट दे दिए होते। यह बहुमत की जोर-जबर्दस्ती है जो हम पर लादी जा रही है (रुकावट)।

श्रीमती दुर्गाबाई (मद्रास) : यह बहुमत पर अल्पमत का अत्याचार हैः न कि बहुमत की जोर-जबर्दस्ती।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : स्त्रियों का अत्याचार।

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वापिस लेना चाहिए; मैं सोचता हूँ यह संसद की अवमानना है।