धारा 4-(संहिता का अध्यारोही प्रभाव) - Page 597

582 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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माननीय उपाध्यक्ष : प्रश्न है :

कि धारा 4 के स्थान पर निम्नलिखित होना चाहिएः

‘‘4. इस अधिनियम के लागू होने से तत्काल पूर्व लागू हिंदू कानून की धार्मिक पुस्तकों में वर्णित व्याख्यानों के सभी नियम अथवा भारत में उच्चतम न्यायालयों के न्यायिक निर्णय अथवा प्रिवी कौंसिल की न्यायिक समिति के निर्णय अथवा पाठ्य पुस्तकों और विद्वान लेखकों व रचनाकारों व अन्य ऐसे व्यक्तियों के व्याख्यानों तथा सभी रीति-रिवाज व प्रथाओं से संबंधित विषय जहाँ तक इस अधिनियम के असंगत होंगे, वे सब उस असंगति की सीमा से प्रभावहीन हो जायेंगे।’’

प्रस्ताव खारिज हुआ।

माननीय उपाध्यक्ष : इसके पश्चात् अगला 420 है।

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पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं इसे वापिस लेने का निवेदन करता हूँ। संशोधन,

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वापिस ले लिया गया।

माननीय उपाध्यक्ष : सरदार हुकम सिंह का संशोधन सं. 129, रोक दिया गया।

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अब 130 है।

प्रश्न है :

कि धारा 4 में निम्नलिखित प्रतिबंध सम्मिलित किया जाएः

‘‘उपबंधित है कि यह संहिता उन सब पर अभिभावी नहीं होगी जो इस संहिता के लागू होने से तत्कालपूर्व, किसी भी तरह के प्रचलित हिंदू कानून के शास्त्र, नियम और व्याख्यान हैं अथवा किसी रीति-रिवाज या प्रथा या कोई अन्य नियम हैं जिन्हें हिंदू-धर्म या किसी अन्य धर्म के मतावलंबियों के धर्मों द्वारा स्वीकृति प्राप्त है और उन पर यह संहिता लागू होनी हैः’’

आगे उपबंधित है कि ‘‘यह संहिता हिंदू कानून के ऐसे विद्यमान लागू शास्त्रों, नियमों और व्याख्याओं अथवा रीति-रिवाज व प्रथाओं पर अभिभावी नहीं होगी जिन्हें इसके पीछे छिपी नैतिकता के कारण स्वीकृति दी जानी है।

प्रस्ताव खारिज हुआ।

माननीय उपाध्यक्ष : अब मैं डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 6 को

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प्रस्तुत करता हूँ।

प्रश्न है :