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उत्तराधिकार के बारे में हो सकता है, या किसी दूसरी बात के बारे में हो सकता है, मैं उनके विस्तार में नहीं जाना चाहता, ऐसा मैंने अमुख खंड प्रस्तुत होने पर कहा लेकिन जैसा कि मैंने कहा है, विशिष्ट चीजें कुछ व्यक्तियों के लिए अच्छी हैं। मैं अपने माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर जिन्हें आधुनिक युग का मनु भी कहा जाता है, से पूछना चाहूँगा यह विशिष्ट प्रकार का विधेयक मुसलमानों के लिए क्यों खराब है; क्यों उन्होंने उनको अलग रखा है, उन्होंने जानबूझ कर यह कहते हुए कि यह संहिता मुसलमानों पर लागू नहीं होगी उन्हें अलग रखा है। अगर यह अच्छा है तो आप पर, मेरे पर, हर एक पर लागू होनी चाहिए। और दूसरे जैसा कि मैंने कहा है, अगर यह कानून खराब है, तो इसे एक विशिष्ट वर्ग के लोगों पर क्यों थोपा जाना चाहिए? अंत में, जब यह प्रश्न आया है कि क्या इस संशोधन को प्रविष्टि मिलनी चाहिए या नहीं जैसा मेरे मित्र जसपत राय कपूर ने कहा है, निवेदन करना चाहूँगा कि हमें अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
* श्री नजीरुद्दीन अहमद : महोदय, माननीय डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत किए गए
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संशोधन के बारे में उस समय मैंने व्यवस्था 51 का प्रश्न उठाया था। सबसे पहले मैं अपने मुद्दे का स्पष्टीकरण करने का प्रयत्न करूँगा, क्योंकि दूसरे संशोधन इसी मुद्दे पर निर्भर करते हैं। आपने ध्यान दिया होगा कि यह संशोधन ऐसी भाषा में लिखा गया है जो सदन के लिए बहुत अधिक अपमानजनक है। इसमें कहा गया है, खंड-2 के, उपखंड (1), एकांश (क) लिए ‘‘हिंदुओं, मतलब सभी व्यक्ति जो हिंदू धर्म को मानते हैं’’ के स्थान पर ‘‘व्यक्ति जो हिंदू हैं’’ और आगे इसी तरह। दूसरे एकांश में शब्द है, ‘‘विकल्प,’’ आदि। मात्र-2 में फिर है ‘‘हटाएँ’’ आदि। इसे आदेश के रूप में अभिव्यक्त किया है। जैसा कि डॉ. पट्टामि ने एक अवसर पर कहा था, डॉ. अम्बेडकर प्राध्यापक की तरह और तानाशाही की तर्ज में बोलते हैं। यह संशोधन उसी भाषा में अभिव्यक्त किया गया है। केवल यह ही नहीं, परन्तु सभी संशोधन। मैंने उनमें से एक का और सभी का परीक्षण किया है। वे सुधार पट्टी के रूप में या एक बड़े सरकारी अधिकारी का अपने मातहत के लिए आदेश के रूप में हैं। इसलिए वह वास्तव में सदन को आदेश है अनिवार्य रूप में ऐसा करे और वैसा करें। साधारणरूप में यह है, ‘‘इसके लिए और ऐसी चीज के लिए निम्न विकल्प होगा,’’ या कि ‘‘निम्न को हटा दिया जाएगा।’’ यही तरीका है। मेरा प्रस्ताव है कि प्रारूप इतनी असावधानी से, इतना अधिक शासकीय तरीके से बनाया गया है कि सदन के लिए इसे औपचारिकता के स्तर के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। सभी संशोधन उसी भाषा में अभिव्यक्त किए गए हैं। मैं गम्भीरता से सदन से विचार करने के लिए
* सं. वा. वि. भाग VIII, खंड II, 5 फरवरी, 1951 पृष्ठ 2404-23