खंड 2 : (संहिता का प्रयोग) - Page 61

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कहता हूँ क्या संशोधन के शब्दों के इस तरीके को किसी तरह स्वीकार किया जा सकता है। मैं इसलिए चाहूँगा कि कुछ संशोधनों को इस आदेशात्मक रूप से बचाया जाए। मैंने सही रूप सुझाया था। तरीका केवल इस सदन में ही नहीं और इसके पूर्ण के सदनों और दूसरे विधानसभाओं में भी है। प्रश्न यह है कि क्या हमें अपने आप पूर्णरूप से नए स्तर को स्वीकार कर लेना चाहिए। कृपया आप सभी संशोधनों का निरीक्षण करें, वे सभी इसी प्रकार अभिव्यक्त किए गए हैं। जो मुद्दा मैंने प्रस्तुत किया है यह है कि क्या यह सही रूप है। अगर नहीं है तो दूसरा संशोधन जो मैंने प्रस्तुत किया है इसे बचाने के लिए उसे प्राथमिकता पर स्वीकार किया जाए। महोदय मैं आपको इसके लिए नियम बनाने के लिए कहता हूँ।

माननीय अध्यक्ष : मैं माननीय सदस्य के भाषण से जो मेरे नियमों के बारे में है से प्रभावित नहीं हूँ। उनके कुछ अभिमत हैं जिनका माननीय डॉ. अम्बेडकर समय पर उत्तर देंगे। इसलिए नियमों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

श्री नजीरुद्दीन : दो और संशोधन जो मैंने प्रस्तुत किए हैं, जो इसके रूप के

खारिज होने या संशोधनों की स्वीकृति पर निर्भर करते हैं। इसीलिए मैं आपसे नियम चाहता हूँ। अगर ये सही रूप में हैं, हम भी ऐसे ही रूप देंगे और सदन को भी इस तरह के अपभ्रष्ट रूप के लिए स्वीकृति दी जा सकती है।

तब खंड-2 के बारे में बहुत से संशोधनों द्वारा एक बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है और बहुत से माननीय सदस्यों द्वारा समर्थन दिया गया है। वह है कि संहिता भारत के सभी व्यक्तियों पर लागू की जानी चाहिए। मुझे इस विचार का समर्थन करने को कहा गया था और मैंने व्यवस्था का प्रश्न उठाया, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया, लेकिन मेरा कहना है कि विधेयक हिंदुओं के लिए खराब है तो इसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। मैं जिस मुद्दे की बात कर रहा था।

श्री जे. आर. कपूर : इसके भाग्य का सभी हिंदुओं या गैर-हिंदुओं पर बराबर असर होना चाहिए।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : यह तर्क का रूप है जो परिहास की तरह है और वास्तव में मानने योग्य है लेकिन गम्भीरता से इस विधेयक को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अगर कानून बुरा है, तो जिनके ऊपर यह लागू होना है उन पर हमें थोपने के लिए इसका विस्तार नहीं किया जाना चाहिए। यह मुद्दा सदन के बाहर बहुत गम्भीरता से उठाया गया है, इस स्वतंत्रता से बातचीत हुई है और यह निश्चित ही कि इसे कानूनी अदालत के सामने नहीं ले जाया जा सकता। हमने संविधान में बहुत सिद्धांत बनाए हैं। हमने संविधान के खंडों को शब्द दिए हैं साधारणतया इसका