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उसकी निजी क्षमता में, कुछ खोट है। मै सोचता हूँ, कोई मंत्री ऐसी संदेहात्मकता उत्पन्न करने के लिए अपना कक्ष नहीं त्यागेगा अतः केवल एक ही सुरक्षित मार्ग है और वह है वक्तव्य देना।
तृतीय, हमारे अपने समाचार-पत्र हैं। उनकी अपनी सदियों पुरानी कभी किसी एक के और कभी दूसरे के विरुद्ध पक्षपात करने की नीति है। उनके निर्णय यदाकदा ही गुणों पर आधारित होते हैं। जब भी उन्हें खाली स्थान मिलता है, वे उसे त्याग-पत्र के लिए ऐसी पृष्ठभूमि प्रदान कर रिक्त स्थान भरने में प्रवृत्त हो जाते हैं जो कि वास्तविक पृष्ठभूमि नहीं होती है परन्तु वह उन पर अधिक प्रकाश डालती है जिसका पक्ष लेना होता है और जिनका पक्ष नहीं लेना होता है उस पर गलत प्रकाश डालती है। मैं देखता हूँ कि कुछ ऐसा ही मेरे विषय में भी घटित हुआ है।
इन्हीं कारणों के फलस्वरूप मैंने जाने से पूर्व वक्तव्य देने का निर्णय लिया।
इस बात को अब 4 वर्ष, एक महीना और 26 दिन हो गए हैं जब प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल में कानून मंत्री का कार्यालय संभालने के लिए मुझे बुलाया था। यह प्रस्ताव मेरे लिए एक बहुत बड़ी अप्रत्याशित घटना थी। मैं विरोधी शिविर में था और जब अगस्त 1946 में अंतरिम सरकार गठित हुई थी तो मुझे पहले ही अयोग्य ठहराया जा चुका था। मैं यही अनुमान लगाता रहा कि प्रधानमंत्री के रवैये में उस बदलाव का क्या कारण हो सकता था। मेरे अपने संदेह थे। मैं यह नहीं जान सकता था कि उन लोगों के साथ किस प्रकार से निभा पाऊँगा जो मेरे कभी भी मित्र नहीं रहे हैं। मुझे संदेह था कि क्या मैं, कानून मंत्री की हैसियत से कानूनी ज्ञान और कुशाग्र बुद्धि के आदर्श को बरकरार रख सकूँगा जो कि उनके द्वारा रखा गया है जिन्होंने मुझे भारत सरकार के कानून मंत्री का पद दिया है। परन्तु मैंने अपने शंकाओं को एक ओर रखते हुए इस आधार पर प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया कि मुझसे जब-जब भी हमारे देश को सुदृढ़ बनाने के लिए कहा जायेगा, मैं अपना सहयोग देने से मना नहीं करूँगा। मंत्रिमंडल के सदस्य और कानून मंत्री की हैसियत से मेरा कार्य-निष्पादन कैसा रहा, मुझे यह अवश्य अन्य लोगों पर निर्णय लेने के लिए छोड़ देना चाहिए।
अब मैं उन विषयों का संदर्भ ग्रहण करूँगा जिन्होंने मेरे सहयोगियों से मुझे अलग कर दिया। काफी समय पूर्व से ही बहुत सी वजहों के कारण जाने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही थी।
मैं सर्वप्रथम केवल वैयक्तिक प्रकार के और विषयों का ही उल्लेख करूँगा जिन्होंने त्याग-पत्र देने के लिए मुझे न्यूनतम प्रेरित किया। वायसराय की कार्यकारी परिषद्