588 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का सदस्य होने के फलस्वरूप, मैं जानता था कि कानून मंत्रालय की प्रशासनिक तौर पर महत्ता नहीं है। इसमें भारत सरकार की नीति बनाने के लिए कोई अवसर प्रदान नहीं किया जाता है। हम इसे खाली साबुनदानी कहा करते थे जो सिर्फ पुराने वकीलों की क्रीड़ा हेतु उचित था। जब प्रधानमंत्री ने मेरे पास प्रस्ताव भेजा, तो मैंने उन्हें बताया था कि मेरी शैक्षणिक योग्यतानुसार तथा अनुभव के आधार पर एक वकील होने के नाते मैं कोई भी प्रशासनिक विभाग चलाने में सक्षम हूँ और पुरानी वायसराय की कार्यकारी परिषद् में मैं दो प्रशासनिक संविभागों को जो कि श्रम और के.लो.नि.वि. हैं देख रहा हूँ जहाँ पर मेरे द्वारा बहुतायत रूप से परियोजनाओं की योजनाबद्ध किया जाता है ओर यह प्रशासनिक संविभाग की तरह का ही है। प्रधान मंत्री ने सहमति जताते हुए कहा कि वे कानून मंत्रालय के अतिरिक्त योजना विभाग भी मुझे सौंप देंगे, जिसका वे निर्माण करने को उद्यत हैं। दुर्भाग्यवश योजना विभाग अधिक विलंब से अस्तित्व में आया और जब यह आया, मैं जा चुका था। मेरे समय में, बहुत से विधान एक मंत्री से दूसरे मंत्री को स्थानांतरित हुए। मैंने सोचा था उनमें से किसी एक के लिए मेरे बारे में भी विचार किया जायेगा। परन्तु सदैव ही मुझे विचारार्थ नहीं लिया गया। बहुत से मंत्रियों को दो या तीन-तीन मंत्रालय दिये गए जिससे उन पर अत्यधिक कार्य बोझ बढ़ गया। अन्य मेरी तरह, और भी अधिक काम चाहते रहे। मेरा यहाँ तक कि अस्थायी तौर पर तब भी विभाग संभालने के लिए विचार नहीं किया गया था जब प्रभारी मंत्री कुछ दिनों के लिए विदेश चले गए थे। यह समझना कठिन है कि सरकारी कार्य के वितरण में वह कौन-सा सिद्धांत है जिसे प्रधानमंत्री अपना रहे हैं। क्या यह सक्षमता है? क्या यह विश्वास है? क्या यह मैत्री है? क्या यह आज्ञाकारिता है?
मुझे यद्यपि कैबिनेट की मुख्य समिति का सदस्य नियुक्त नहीं किया गया था जैसे कि विदेश मामलों की समिति या रक्षा समिति। जब आर्थिक मामलों की समिति गठित की गई थी, तो मुझे लगा था कि इस तथ्य को दृष्टिगत करते हुए कि मैं अर्थव्यवस्था एवं वित्त का प्राथमिक छात्र रहा हूँ, मुझे इस समिति में नियुक्त किया जायेगा। परन्तु मुझे छोड़ दिया गया। जब प्रधानमंत्री इंग्लैंड जा चुके थे, तब मुझे मंत्रिमंडल द्वारा इसमें नियुक्त किया गया। परन्तु जैसे ही वे वापिस लौट कर आए, उन्होंने मंत्रिमंडल के पुनर्गठन के अपने बहुत से प्रयासों में से एक के अंतर्गत मुझे निकाल दिया। इसके परिणामस्वरूप पुनर्गठन में समिति में मेरा नाम सम्मिलित किया गया परन्तु वह मेरे प्रतिवाद के फलस्वरूप किया गया था।
प्रधानमंत्री, मुझे विश्वास है, इस बात पर सहमत होंगे कि मैंने कभी भी इस संबंध में उनसे कोई शिकायत नहीं की है। मैं कभी भी मंत्रिमंडल में राजनैतिक शक्ति