589
के खेल या जब भी कोई स्थान रिक्त हुआ उस समय विभागों की छीना-झपटी के खेल के दलों में नहीं रहा हूँ। मैं सेवा में विश्वास रखता हूँ, उस पद पर सेवा में जिसे प्रधान मंत्री ने, जो मंत्रिमंडल के प्रमुख हैं, मुझे योग्य समझ कर सौंपा। इसलिए मेरा यह सोचना मेरे लिए पूर्णतः अमानवतापूर्ण होगा कि मेरे साथ उचित नहीं किया गया।
अब मैं दूसरे विषय का उल्लेख करूँगा जिससे मैं सरकार से असंतुष्ट रहा। यह पिछड़ी जाति ओर अनुसूचित जाति के साथ किए जा रहे बर्ताव से संबंधित है। मैं अत्यधिक दुखी था कि संविधान में पिछड़ी जातियों की सुरक्षा के लिए कोई उपाय शामिल नहीं किए गए हैं। यह कार्य, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने वाले एक आयोग की सिफारिशों के आधार पर कार्यकारी सरकार द्वारा, किया जाना था। संविधान को पारित किए एक वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो चुका है। परन्तु सरकार ने अब तक आयोग की नियुक्ति तक के संबंध में नहीं सोचा है। वर्ष 1946 में जिस दौरान मैं कार्यालय से बाहर रहा, मेरे लिए और अनुसूचित जाति के लिए संवैधानिक सुरक्षा के उपाय के मामलों में किए गए वायदों से नई शक्ति का संचार हुआ और अनुसूचित जाति को यह ज्ञात नहीं था कि संविधान समिति उस आधार पर क्या करेगी। इस उत्सुकता के दौर में, मैंने अनुसूचित जाति की दशा पर संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्तुत करने के लिए एक रिपोर्ट * तैयार की। लेकिन मैंने इसे प्रस्तुत नहीं किया। मैंने अनुभव किया था कि संविधान समिति तक उसका इंतजार करना और आगामी संसद को यह विषय लेने के लिए अवसर प्रदान करना, यथोचित होगा। संविधान में किए गए अनुसूचित जाति की स्थिति की सुरक्षा के प्रबंध मुझे संतोषजनक नहीं लगे। तो भी मैंने उन्हें इस आशा से मान लिया कि चाहे वे जैसे भी थे, सरकार उनको प्रभावी बनाने में मजबूती दिखाएगी। आज अनुसूचित जाति की क्या स्थिति है? जहाँ तक मुझे दृष्टिगोचर होता है, उनकी स्थिति पूर्ववत् है। वही पुरातन अत्याचार, वही पुराना उत्पीड़न, वही प्राचीन भेदभाव जो पहले विद्यमान था, अभी भी विद्यमान है, और संभवतः सबसे अधिक बुरी दशा में हैं। मैं ऐसे सैकड़ों मामले बता सकता हूँ जहाँ अनुसूचित जाति के दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के लोग, स्वर्ण हिंदू और पुलिस, जिसने उनकी शिकायत दर्ज करने से इन्कार कर दिया और किसी भी प्रकार की सहायता से मना कर दिया, के विरुद्ध अपनी दुख भरी गाथा लेकर मेरे पास आए हैं। मुझे यह सोचकर आश्चर्य होता है कि भारत के अनुसूचित जाति के लोगों की दुर्दशा के समान दुनिया में कहीं और भी क्या अन्य
* संपादक को इस रिपोर्ट के न मिल पाने की असमर्थता पर खेद है और इस संबंध में किसी भी प्रकार की सहायता करने वालों का स्वागत है। -संपादक