590 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लोगों की ऐसी दशा है। मैंने ऐसी स्थिति अन्य किसी की भी नहीं पाई है। और फिर भी अनुसूचित जाति को कोई भी राहत प्रदान क्यों नहीं की गई है? इसकी तुलना में सरकार मुसलमानो को अधिक सुरक्षा प्रदान करती प्रतीत होती है। प्रधानमंत्री का संपूर्ण समय एवं ध्यान मुसलमानों के संरक्षण के लिए समर्पित हो जाता है। मैं किसी को भी कुछ कहना नहीं चाहता हूँ यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भी नहीं। मेरी इच्छा है भारत के मुसलमानों को जहाँ जिस और जैसा चाहिए उन्हें मिलना चाहिए। परन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या, मुसलमान लोग ही केवल ऐसे हैं जिन्हें संरक्षण की आवश्यकता है? क्या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और भारतीय ईसाइयों को संरक्षण की आवश्यकता नहीं है? इन समुदायों के लिए उन्होंने क्या चिन्ता दर्शायी? जहाँ तक मुझे ज्ञात है, अन्य कोई भी नहीं केवल इन समुदायों को ही मुसलमानों से अत्यधिक देख-रेख और ध्यान देने की आवश्यकता है।
सरकार द्वारा अनुसूचित जाति की, की गई उपेक्षा पर उत्पन्न हुए रोष को मैं दबाकर नहीं रख सकता था और एक अवसर पर अनुसूचित जाति की सार्वजनिक सभा में मैंने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर ही दिया। माननीय गृहमंत्री द्वारा एक प्रश्न पूछा गया था कि मेरे द्वारा लगाया गया आरोप, कि अनुसूचित जाति को उस नियम के अंतर्गत लाभ प्रदान नहीं किया जिससे उन्हें 12 प्रतिशत प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है, क्या सही है। इस प्रश्न के उत्तर में माननीय गृह-मंत्री यह कहते हुए आनंदित थे कि मेरा आरोप निराधार है। मुझे सूचना मिली थी कि किन्हीं कारणों वश संभवतः उनके अंतर्मन के संदेह की पुष्टि के लिए ऐसा किया गया हो-उन्हें भारत सरकार के विभिन्न विभागों में यह पूछने के लिए कि सरकारी सेवा में हाल ही में कितने अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों की भर्ती की गई है, दौरे पर जाना पड़ा। मुझे सूचना मिली कि अधिकांशतः विभागों ने पूर्ण नकारात्मक अथवा लगभग नकारात्मक उत्तर दिया। यदि मुझे प्राप्त सूचना सही है, तो माननीय गृह-मंत्री द्वारा दिए गए उत्तर के एवज में मुझे कोई टीका टिप्पणी करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
अपनी बाल्यावस्था से ही मैंने स्वयं को अनुसूचित जाति के, जिसमें मेरा जन्म हुआ था, उत्थान हेतु समर्पित कर दिया था। यह बात नहीं है कि मेरे मार्ग में कोई प्रलोभन नहीं थे यदि मैं अपने ही हितों के बारे में सोचता, तो मुझे वह सब मिल जाता जिसकी भी मैं इच्छा रखता और यदि मैं कांग्रेस में चल गया होता तो उस दल में सर्वोच्च स्थान पर पहुँच गया होता। परन्तु जैसा मैंने कहा कि, मैंने स्वयं को अनुसूचित जाति के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया था और मैंने उस कहावत को अपनाया जो कहती है कि यदि आप किसी उद्देश्य के बारे में उत्साही होना चाहते हैं और उस उद्देश्य को पूर्ण करना चाहते हैं तो आपके लिए संकीर्ण-विचारधारा वाला बनना ही अधिक उचित है। इसलिए आप अनुमान लगा सकते हैं कि मुझे यह