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देखकर कितना दर्द हुआ होगा कि अनुसूचित जाति का उद्देश्य बहिष्कृत कर ‘कुछ नहीं’ के कूड़ेदान में डाल दिया गया है।
तीसरा विषय जिसने मुझे केवल असंतोष का ही नहीं, बल्कि वास्तविक चिंता यहाँ तक की आशंका का भी कारण प्रदान किया, देश की विदेशी नीति है। कोई भी, जिसने भारत के प्रति अन्य देशों के व्यवहार सहित हमारी विदेशी नीति के पाठ्यक्रम का अनुकरण किया है, यह स्पष्ट रूप से समझने में असफल नहीं हो सकता है कि हमारे प्रति उनके रवैये में अचानक परिवर्तन आ गया है। 15 अगस्त, 1947 को जब हमने एक स्वतंत्र देश के रूप में अपने जीवन का आरंभ किया था, तो ऐसा कोई भी देश नहीं था जिसने हमारे लिए बुरी कामना की हो। प्रत्येक देश हमारा मित्र था। आज, चार वर्षों के पश्चात् हमारे सभी मित्र हमें छोड़ गए हैं। हमारा कोई मित्र नहीं रह गया है। हमने स्वयं ही विमुख कर दिया है। हम अकेली लीक पर चल रहे हैं कोई और नहीं है जो संयुक्त राष्ट्र में हमारे संकल्प में हमारे साथ खड़ा हो सके। मैं जब भी हमारी विदेश-नीति के संबंध में सोचता हूँ, मुझे याद पड़ता है बिस्मार्क और बरनार्ड शॉ ने क्या कहा था। बिस्मार्क ने कहा था कि ‘‘राजनीति आदर्श की अनुभूति का खेल नहीं है। राजनीति संभव होने का खेल है।’’ बरनार्ड शॉ ने यह बहुत समय पहले नहीं कहा था कि सही आदर्श उचित हैं परन्तु किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुत अधिक अच्छा होना अक्सर खतरनाक होता है। हमारी विदेश नीति दुनिया के दो सबसे महान व्यक्तियों द्वारा कहे गए इन सत्य वचनों से पूर्णतया उलट है।
हमारे लिए कितनी खतरनाक रही है यह असंभव को कर दिखाने वाली नीति और बहुत अच्छी होते हुए जो कि व्याख्यायित की गई है हमारे स्रोतों पर विशाल निष्कासन द्वारा, हमारी सेना व्यय द्वारा, हमारे लाखों भूखों के लिए भोजन जुटाने के द्वारा तथा हमारे देश के औद्योगीकरण के लिए सहायता देने के द्वारा। हमारे वार्षिक वसूले गए राजस्व के 350 करोड़ रुपयों में से 180 करोड़ रुपये हम फौज पर खर्च करते हैं। यह एक बड़ा व्यय है जिसका मुश्किल से ही कोई सानी है। यह विशाल व्यय हमारी विदेश नीति का ही सीधा परिणाम है। हमें स्वयं ही अपनी रक्षा के लिए पूर्ण बिल को कार्यान्वित करना चाहिए क्योंकि हमारे कोई मित्र नहीं हैं जिस पर किसी आपत्तिकाल के समय में, जो कभी भी उत्पन्न हो सकता है, मदद के लिए हम निर्भर रह सकें। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि क्या यह विदेश नीति का उचित ढंग है।
पाकिस्तान से हमारा झगड़ा हमारी विदेश नीति का एक अंग है जिसके संबंध में मैं गहरा असंतोष अनुभव करता हूँ। वे दो आधार जिसने पाकिस्तान के साथ हमारे