वक्तव्य, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के त्याग-पत्र देने पर दिया गया स्पष्टीकरण - Page 607

592 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

संबंधों में रुकावटें डालीं है- एक कश्मीर और दूसरा पूर्वी बंगाल में हमारे लोगों की दशा, है। मेरा मानना था कि हमें पूर्वी बंगाल पर कश्मीर से अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, जहाँ के बारे में सभी समाचार-पत्रों से हमारे लोगों की असहनीय दुर्दशा का पता चलता है। इसके बावजूद भी हम कश्मीर के मुद्दे पर अपना सब-कुछ दांव पर रख रहे हैं। यहाँ तक कि मैं समझता हूँ कि हम एक अवास्तविक मुद्दे पर लड़ रहे हैं। जिस मामले पर हम झगड़ रहे हैं वह अधिकतर समय यहीं रहता है कि कौन सही है और कौन गलती पर है। मेरे दिमाग में कौन सही है यह वास्तविक मुद्दा नहीं है बल्कि क्या सही होना चाहिए, यह है। इसको मुख्य प्रश्न मानते हुए मेरा दृष्टिकोण सदैव यही रहा है कि इसका उचित समाधान कश्मीर का विभाजन है। हिंदू और बौद्धों का इलाका भारत को दे दो और मुसलमानों का इलाका पाकिस्तान को दे दो जैसा कि हमने भारत के मामले में किया था। हमें वास्तव में कश्मीर के मुसलमानों के इलाके से कोई सरोकार नहीं है। यह मसला तो, कश्मीर के मुसलमानों और पाकिस्तान के बीच का है। वे उसका अपनी इच्छानुसार जैसा चाहेंगे, निर्णय ले लेंगे। अन्यथा यदि आप चाहते हैं तो, इसको तीन भागों में विभाजित कर देंः युद्ध स्थगन क्षेत्र, घाटी और जम्मू-लद्दाख क्षेत्र और केवल घाटी में जनमत। पर मुझे इस बात से डर है कि प्रस्तावित जनमत-संग्रह में, जिसे कि पूर्णतया जनमत होना चाहिए, कश्मीर के हिंदू और बौद्धों पर उनकी इच्छाओं के विपरीत बहुत संभव है कि पाकिस्तान ले लिया जाए और हमें उसी प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगी जैसा हम आज पूर्वी बंगाल के संबंध में कठिनाइयों का कर रहे हैं।

अब मैं चौथे विषय के संबंध में जिक्र करूँगा जिसका मेरे त्याग-पत्र देने से पर्याप्त उचित संबंध है। मंत्रिमंडल तो समिति द्वारा पूर्व ही ले लिए गए निर्णयों के पंजीकरण और रिकार्डिंग का कार्यालय मात्र है। जैसा मैं कह चुका हूँ, मंत्रिमंडल अब समितियों द्वारा कार्य करता है। एक रक्षा समिति है। एक विदेश समिति है। विदेशों से संबंधित सभी मामले इसके द्वारा ही निपटाये जाते हैं। रक्षा से संबंधित सभी मामले रक्षा समिति द्वारा निपटाए जाते हैं। उनके द्वारा मंत्रिमंडल के वही सदस्य नियुक्त किए जाते हैं। मैं इन दोनों में से किसी भी समिति का सदस्य नहीं हूँ। वे लौह-जाल के पीछे से कार्य करते हैं। अन्य लोग जो इसके सदस्य नहीं हैं उन्हें नीति-निर्धारण में भाग लेने का अवसर मिले बिना ही केवल संयुक्त उत्तरदायित्व का निर्वाह करना होता है। यह एक असंभव स्थिति है।

अब मैं उस विषय को लूँगा जिसने मुझे अंतिम रूप से निर्णय लेने के लिए बाध्य किया कि मुझे त्याग-पत्र दे देना चाहिए। यह हिंदू संहिता विधेयक के संबंध में किया गया व्यवहार था। यह विधेयक इस सदन में 11 अप्रैल, 1947 को प्रस्तुत