वक्तव्य, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के त्याग-पत्र देने पर दिया गया स्पष्टीकरण - Page 608

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किया गया था। चार वर्ष जीवित रहने के पश्चात्, इसे विफल कर दिया गया और उसकी 4 धाराएँ पारित करने के पश्चात् इसे खामोशी से खत्म होने दिया गया। जब यह सदन के समक्ष रखा था, यह मनमौजी ढंग से टिका रहा। पूरे एक वर्ष तक सरकार ने इसको प्रवर समिति को सौंपने की आवश्यकता नहीं समझी। 19 अप्रैल, 1948 को इसे प्रवर समिति को सौंपने की आवश्यकता नहीं समझी। 19 अप्रैल, 1948 को इसे प्रवर समिति को निर्देशित किया गया। सदन में 12 अगस्त, 1948 को रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। 31 अगस्त 1948 को रिपोर्ट पर विचार करने का प्रस्ताव मेरे द्वारा रखा गया। यह प्रस्ताव मात्र इसलिए था कि विधेयक को कार्यसूची में रखा जाना चाहिए। इस प्रस्ताव पर तब तक चर्चा शुरू करने की अनुमति नहीं दी गई थी जब तक कि फरवरी सत्र 1949 आरंभ नहीं हो गया। उसके बावजूद भी इस पर सिलसिलेवार चर्चा करने की अनुमति नहीं दी गई थी। इसे 100 महीनों में बाँट दिया गया था, फरवरी में 4 दिन, मार्च में 1 दिन और अप्रैल 1949 में 2 दिन। इसके पश्चात् दिसम्बर 1949 में इस विधेयक को एक दिन दिया गया, यथा 19 दिसम्बर को दिया गया जिस दिन सदन ने मेरे इस प्रस्ताव को मान लिया था कि विधेयक को विचारार्थ लिया जायेगा, ऐसी चयन समिति की रिपोर्ट थी। सन 1950 में विधेयक को कोई समय नहीं दिया गया। अगली दफा विधेयक सदन के समक्ष 5 फरवरी, 1951 को रखा गया जब विधेयक को धारानुसार विचार-विमर्श हेतु लिया गया। केवल 5, 6 और 7 फरवरी, तीन दिन ही विधेयक को दिए गए और वहीं सड़ने के लिए छोड़ दिया।

क्योंकि यह विद्यमान संसद का अंतिम सत्र था, इसलिए मंत्रिमंडल को इस पर विचार करना था कि क्या हिंदू संहिता विधेयक को इस संसद में ही पूरा विचारार्थ लिया जाए अथवा नई संसद के लिए छोड़ दिया जाए। मंत्रिमंडल ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि इसको इस संसद में पूर्ण रूप से ले लिया जाए। इसलिए विधेयक को कार्यसूची में सम्मिलित किया गया और 17 सितम्बर, 1951 को प्रत्येक धारानुसार विचार-विमर्श हेतु लिया गया। जब चर्चा जारी थी तो प्रधानमंत्री ने एक नया प्रस्ताव पेश कर दिया यथा पूरे विधेयक को उपलब्ध समय में न लिया जाए और यह वांछनीय था कि बजाए इसके कि विधेयक को पूरा ही विफल हो जाने दिया जाए, इसके एक भाग को कानून के रूप में लागू किया जाए। यह मेरे लिए एक बहुत बड़ा आघात था। परन्तु मैं सहमत हो गया, एक कहावत के अनुसार, जो कहती है कि ‘‘जब पूरा का पूरा ही समाप्त हो रहा हो, तो यह अधिक अच्छा होगा कि कुछ भाग को बचा लिया जाए।’’ प्रधानमंत्री का सुझाव था कि हमें विवाह एवं तलाक भाग का चुनाव कर लेना चाहिए। विधेयक अपने बहुत अधिक संक्षिप्त रूप से चलता गया।