वक्तव्य, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के त्याग-पत्र देने पर दिया गया स्पष्टीकरण - Page 609

594 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दो या तीन दिन तक एक विधेयक पर चर्चा के पश्चात् प्रधानमंत्री एक अन्य प्रस्ताव लेकर आ गए। इस बार उनका प्रस्ताव था कि पूरे विधेयक को यहाँ तक कि विवाह व तलाक भाग को भी छोड़ दो। यह मेरे लिए एक बहुत ही गहरा सदमा था - एक आकस्मिक घटना। मैं हक्का-बक्का रह गया था और कुछ भी नहीं कह सका था। मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि इस अत्यधिक संक्षिप्त विधेयक को छोड़ने का कारण केवल समय का अभाव है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि संक्षिप्त विधेयक इसलिए छोड़ दिया गया था क्योंकि अन्य और अधिक ताकतवर मंत्रिमंडल के सदस्य अपने-अपने विधेयकों के लिए वरीयता चाहते थे। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि बनारस और अलीगढ़ विश्वविद्यालय विधेयकों को और प्रेस विधेयक को हिंदू संहिता के इतने छोटे स्वरूप में हो जाने के बावजूद भी उस पर वरीयता कैसे दी गई है? ऐसा नहीं है कि परिनियम पुस्तक में अलीगढ़ विश्वविद्यालय अथवा बनारस विश्वविद्यालय का प्रबंध करने के लिए कोई कानून नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि यदि इस सत्र में इस विधेयक को पारित नहीं किया जाता तो ये विश्वविद्यालय ढह जाते या जीर्ण-शीर्ण हो जाते। ऐसा नहीं था कि प्रेस विधेयक अति आवश्यक था। परिनियम पुस्तिका में पहले ही कानून उल्लिखित था और विधेयक को रोका जा सकता था। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि प्रधान मंत्री में यद्यपि निष्कपटता बरतते हुए भी, हिंदू संहिता विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक गाम्भीर्यता और दृढ़ता नहीं है।

इस विधेयक के संबंध में मुझे सर्वाधिक मानसिक यातना से होकर गुजरना पड़ा है। मुझे दल की कार्यप्रणाली द्वारा सहायता नहीं मिली। प्रधानमंत्री ने वोट की स्वतंत्रता प्रदान की, जो कि दल के इतिहास में एक असाधारण घटना थी। मैंने इसका बुरा नहीं माना। परन्तु मुझे दो बातों की अपेक्षा थी। मैंने एक दल नियंत्रक की अपेक्षा की थी जो भाषण का समय सीमित रखे और मुख्य सचेतक जो पर्याप्त वाद-विवाद के पश्चात् इसकी समाप्ति के निर्देश दे सके। समय सीमित रखते हुए एक नियंत्रक द्वारा विधेयक को पूर्ण किया जा सकता था। जब वोट की स्वतंत्रता दी गई थी तो भाषणों पर भी समय सीमित किए जाने के लिए एक सचेतक दिए जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं की जा सकती थी। परन्तु इस प्रकार का कोई सचेतक कभी भी नहीं दिया गया था। संसदीय मामलों के मंत्री जो हिंदू अधिनियम के संबंध में दल के मुख्य सचेतक है, का आचरण, कम से कम कहूँ, सर्वाधिक असाधारण रहा था। वे अधिनियम के पूर्णतया विरोधी रहे और वे कभी भी समापन प्रस्ताव रख कर मेरी सहायता करने के लिए उपस्थित नहीं रहे। कई दिनों और कई घंटों तक एक ही धारा पर अड़ंगे बाजियाँ चलती रही थीं। परन्तु मुख्य सचेतक, जिसका कार्य सरकारी समय की किफायत करना और सरकारी कारोबार को आगे बढ़ाना है, इरादतन नियमित रूप से अनुपस्थित रहते थे, जब हिंदू अधिनियम सदन में विचारार्थ लिया जाता था।