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मैंने मुख्य सचेतक का प्रधानमंत्री के प्रति निष्ठाहीन होने का और प्रधान मंत्री का निष्ठाहीन मुख्य नियंत्रक के प्रति निष्ठावान होने का ऐसा पक्षवाद कभी नहीं देखा है। ऐसा असंवैधानिक व्यवहार बरतते हुए भी, मुख्य सचेतक वास्तव में प्रधानमंत्री के कृपा पात्र हैं। उनकी निष्ठाहीनता के बावजूद भी दल संगठन में उनकी पदोन्नति की गई। इस प्रकार के वातावरण में कार्यरत रहना संभव नहीं था।
यह कहा जाता रहा है कि विधेयक इसलिए अस्वीकृत हो गया क्यांकि विरोधी-पक्ष प्रबल था। विरोधी दल कितना प्रबल था? विधेयक पर तो दल में कई बार चर्चा की जा चुकी थी और विपक्षियों द्वारा ही इसके खण्ड बनाए गए थे। प्रत्येक समय विरोधकर्त्ताओं को मार्ग से हटाया गया था। अंतिम बार जब विधेयक को दल की बैठक में प्रस्तुत किया गया था तो 120 सदस्यों में से केवल 20 सदस्य ही इसके विरोधी पाए गए थे। जब विधेयक को विचार-विमर्श हेतु दल में प्रस्तुत किया गया तो लगभग 3 घंटों के समय में 44 धाराएँ पारित कर दी गई थीं। इससे यह प्रकट होता है कि दल में विधेयक के प्रति कितना विरोध किया गया था। स्वयं सदन में भी विधेयक का तीन धाराओं-2, 3 व 4 पर विभाजन हो गए थे। प्रत्येक समय इसके समर्थन में यहाँ तक कि धारा 4 पर भी, जो कि हिंदू अधिनियम की आत्मा, अत्यधिक बहुमत मिला था।
इसी कारण से, मैं प्रधानमंत्री के समयाभाव के कारण विधेयक को छोड़ देने के निर्णय को मानने के लिए किसी भी प्रकार से तैयार नहीं था। मैं अपने त्याग-पत्र के संबंध में यह विस्तृत स्पष्टीकरण देते हुए अनुगृहीत हूँ क्योंकि कुछ लोगों का अनुमान था कि मैं अपनी अस्वस्थता के कारण जा रहा हूँ। इस प्रकार के किसी भी प्रस्ताव का मैं खंडन करता हूँ। मैं ऐसा अंतिम व्यक्ति होऊँगा जो अस्वस्थता के कारण अपने कर्त्तव्य को त्याग देगा।
संभवतः यह भी कहा गया था कि मेरा त्यागपत्र समय व्यतीत हो जाने के पश्चात् दिया गया था और यदि मैं सरकार की विदेश नीति से और पिछड़ी जातियों व अनुसूचित जातियों के प्रति किए जा रहे बरताव से असंतुष्ट था तो मुझे पहले ही पद त्याग देना चाहिए था। यह आरोप शायद उचित प्रतीत होता है। परन्तु मेरे पदासीन बने रहने के कारण थे। प्रथम स्थान पर है कि अधिकांश समय मैं मंत्रिमंडल का सदस्य रह चुका हूँ और मैं संविधान की रचना करने में व्यस्त रहा हूँ। 26 जनवरी, 1950 तक मेरा पूर्ण ध्यान संविधान पर ही लगा रहा। तदोपरांत मैं जन प्रतिनिधि विधेयक तथा सीमांकन आदेशों में व्यस्त रहा। हमारे विदेशी मामलों को देखने के लिए तो मुझे मुश्किल से ही समय मिला होगा। इस कार्य को अधूरा छोड़कर जाना मुझे उचित विचार नहीं लगा था।