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नतीजा यह हुआ कि उन्होंने हमें कठिनाइयों में डाल दिया। संविधान इस विधेयक को पारित करने के आड़े आता है।
श्री त्यागी : हम संविधान को बदल देंगे।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मेरे विद्वान मित्र कहते हैं अगर संविधान बुरी तरह बना है और उसने हमें कठिनाइयों में डाल दिया है तो क्यों न संविधान को ही बदल दिया जाए। मैं पूछता हूँ आपको हिंदुओं के लिए कानून बनाने की स्वतंत्रता क्यों है? क्यों हिंदुओं और मुसलमानों में अपने घरेलू दायरे में अन्तर की एक नीति मान लेनी चाहिए! मैं सोचता हूँ यह कोई तर्क नहीं है। यह ठीक नहीं है। हिंदुओं को घर में हिंदू रहना चाहिए, अपने धार्मिक व्यवहार में हिंदू होना चाहिए। इसी तरह ईसाईयों और मुसलमानों को अपने विचारों, पूजा और धर्म जिसकी संविधान में पाए गए दोषों की दृष्टि से, इसे बदलने की आवश्यकता है। मेरे विचार से संविधान के पारित होने के दो वर्षों के भीतर इसमें संशोधन कर दिया जाए या यह दो वर्ष बाद होगा। इसलिए हमारे लिए यही समय है जब संविधान में सुधार किया जाए जिससे कि हिंदुओं को प्रभावित करने वाला एक अच्छा कानून पारित हो सके। जहाँ तक धार्मिक और कम धार्मिक विषयों का सम्बन्ध है कानून दखल नहीं दे सकता, कम-से-कम ऊपर से जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए। यह एक प्रकार की तानाशाही होगी जो प्रजातांत्रिक समाज में नहीं होती।
श्री त्यागी : विवाह और तलाक धर्म के अंदर नहीं आते।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मेरे विचार से हिंदू विवाह एक संस्कार है; यह दसवाँ संस्कार है; यह उनके धर्म का भाग है और इस पर तर्क करना कि यह धर्म का भाग नहीं है बेकार है। मैं कहता हूँ कि आप धर्म को समाप्त कर दो और कानून तुमको स्वतंत्रता देता है और एक संविधान के अन्दर एक प्रभुत्वसम्पन्न सदन है। अगर आप चाहें तो धर्म को मिटा सकते हैं लेकिन क्या आप इस हद तक जायेंगे? जहाँ तक इसका सम्बन्ध है। मैं इस पर आगे जोर नहीं देना चाहता लेकिन जिनमें हम आज हैं उन हालात को देखें। हमारे पास खाना नहीं है। हम दूसरे देशों से इस वर्ष जीवित रहने के लिए खाना मंगवाने के लिए 200 करोड़ रुपए खर्च करते हैं (रुकावट)। हमारे पास कपड़े नहीं हैं। हमारे बहुत से देशवासियों के लिए रहने की जगह नहीं है; हम सबको प्रारंभिक शिक्षा नहीं दे सकते लेकिन हम क्या देते हैं हिंदुओं को एक मुफ्त उपहार हिंदू संहिता के रूप में। अगर आप उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं, आपको उनको भोजन देना चाहिए, उनको शिक्षा दें।
उपसंचार मंत्री (श्री खुर्शीद लाल) : विधेयक की प्रस्तुति पर विचारार्थ यह एक
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बहुत अच्छा तर्क हो सकता है। अब हम एक विशेष खंड पर विचार कर रहे हैं।