48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय अध्यक्ष : मैं उनकी अन्तिम टिप्पणी के अन्तिम शब्द सुनने की प्रतीक्षा कर रहा था कि अपने अनुभवों के आधार पर क्या मतलब सुझाते हैं।
श्री त्यागी : मैं यह चाहता हूँ कि एक मुसलमान हमारे शास्त्रों से कैसे उद्धरण देता है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : हमें इस संहिता के बारे में सोचना चाहिए हमें अधिकाधिक आवश्यक चीजों जिनसे लोग प्रसन्न हों, के बारे में विचार करना चाहिए जैसे प्राथमिक शिक्षा आदि। इस विपत्तिकालीन समय में एक और संकट विश्व की गिरती स्थिति का है। भारत की ओर युद्ध धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
माननीय अध्यक्ष : मुझे बहुत दुख है। मैं दखल नहीं देना चाहता लेकिन माननीय सदस्य तर्कों के समुद्र हैं। उन्हें अपने संशोधन पर आगे बढ़ना चाहिए।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मेरा केवल यही प्रस्ताव था कि यह इस विधेयक पर विचार करने का सही समय नहीं है।
श्री खुर्शीद लाल : हम विधेयक पर विचार के लिए चर्चा नहीं कर रहे।
माननीय अध्यक्ष : मेरा कहना है कि माननीय सदस्य अपने संशोधनों पर बोलें। अगर वे चाहते हैं डॉ. अम्बेडकर अभी तक के किसी प्रमुख संशोधन के बारे में बोलें तो वे सही नहीं है, मैं उसके लिए निश्चित रूप से स्वीकृति दूँगा लेकिन अगर वे कहते रहें कि इस विधेयक को आगे नहीं बढ़ना चाहिए तो मैं सोचता हूँ यह किसी भी माननीय सदस्य के क्षेत्र से बाहर है इस स्थिति में यह कहा जा सकता है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : इस सुझाव को देने के लिए उत्साहित होने का कारण था कि यह समझा जाता है कि सरकार ने इस विधेयक पर बात करने के लिए केवल दो या तीन दिन देने का निश्चय किया है।
माननीय अध्यक्ष : मैं कहूँगा कि माननीय सदस्य अपने संशोधनों पर आगे बढ़ें।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : (रुकावट) मेरे विचार से कुछ माननीय सदस्यों को व्यवधान करने के अलावा कुछ और सोचने के लिए नहीं है। महोदय मेरे बहुत से संशोधन हैं और जिन्हें एक-एक करके लेना होगा। पहले दो संशोधनों नं. 16 और 17 डॉ. अम्बेडकर के द्वारा रखे गए प्रस्तावों के प्रारूप में सुधार के बारे में सुझाए गये थे। उनमें प्रारूप बदलने के अलावा कोई और सिद्धांत की बात नहीं है। अब मैं संशोधन नं. 19 पर आता हूँ।