खंड 2 : (संहिता का प्रयोग) - Page 70

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श्री नजीरुद्दीन अहमद : सबसे पहले जनमत के साथ आपको उन तक धीरे-धीरे पहुँचना चाहिए। पहले उसको ऐच्छिक बनाएं और फिर अगर कानून हर एक के लिए अच्छा है तो वे उसकी ओर आकर्षित होंगे। जल्दी पंजीकरण करवाने के लिए आप एक-दूसरे पर जोर देंगे और एक-दूसरे में होड़ लग जाएगी। कानून को स्वैच्छिक रूप से लोगों को आकर्षित करना चाहिए जोर जबरदस्ती से नहीं। इन संशोधनों और सुझावों के पीछे यह ही सबसे बड़ा सिद्धांत है। इसका मतलब यह नहीं की हर कोई अपने लिए कानून बनाने लगें बल्कि यह कुछ लोग कानून को 33 करोड़ लोगों पर थोप रहे हैं....

एक माननीय सदस्य : आप यह कहने वाले कौन होते हैं?

श्री श्यामनंदन सहाय : अंततः यही सही स्थिति है। आगे बढ़ें। उनको अपनी आवाज ऊपर तेज रखने दो।

माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्यों को बैठे हुए आपस में बातें नहीं करते रहना चाहिए। इससे भ्रम पैदा होगा। माननीय सदस्य आगे बढ़ें।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : इसी से मैं इस संहिता को स्वैच्छिक आधार पर लागू करने के लिए हार्दिक रूप से इस सुझाव का समर्थन करता हूँ। उसके बाद इसको आगे बढ़ाएं। तब मैं यह कहने की हिम्मत कर सकता हूँ कि अगर कानून अच्छा है तो धीरे-धीरे हर कोई इसको मानेगा। इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि कानून को उन पर जो इसके लिए सही है, पर लागू करें।

भारत एक बड़ा महाद्वीप है जहाँ बहुत प्रगतिशील लोग भी हैं और बहुत पिछड़े लोग भी हैं। कानून माननीय सदस्यों के लिए अच्छा है क्योंकि यह उस समुदाय के लिए अच्छा है जिससे अधिकतर सदस्य आए हैं। लेकिन यह पहाड़ी जनजातियों, आदिवासियों और पिछड़े वर्ग जो शिक्षित नहीं है और जिनके पास दो वक्त का खाना भी नहीं है पर क्यों लागू किया जाना चाहिए। कलम के नुकते से उनकी इच्छाओं के विरुद्ध उन पर क्यों लागू किया जाना चाहिए? यह एक बिन्दु इन दो संशोधनों के सुझावों से उभरता है। यह अनुभव है तर्क नहीं, जिसे कानून का मार्गदर्शन होना चाहिए। इसलिए मैं कहता हूँ कि कानून उन्हीं पर लागू होना चाहिए जो इसे मानते हों और वो जो उसके लिए ठीक हो। धीरे-धीरे वो जो इसके लिए कुछ सही है यह उन पर भी लागू हो जाएगा.....

श्री खुर्शीद लाल : इसीलिए यह आप पर लागू नहीं होता।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं मानता हूँ मैं इस कानून के लाभों की प्रशंसा करने के लिए भी बहुत पिछड़ा हुआ हूँ यह कानून बहुत उलझा हुआ है। इसमें हिंदू कानूनों