56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की सभी चीजें नहीं हैं। यह मुस्लिम कानून से, ईसाई कानून से लिया गया है और उनके कानूनों के सबसे खराब तत्वों को लिया गया है। इसलिए मैं एक पिछड़ा व्यक्ति कहलाना पसंद करूंगा। जिससे कि मैं अपने माननीय मित्र श्री खुर्शीद लाल को प्रसन्न कर सकूँ, न कि एक सभ्य व्यक्ति जाना जाऊँ और मुझे कानून को सहमति देनी पड़े जो मेरे ऊपर लागू नहीं होता और मुझे प्रभावित भी नहीं करता। सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि सरकार एक ऐसे सिद्धांत के लिए बाध्य है जो अपरिपक्व है और बाहर के व्यक्ति उसके विरुद्ध हैं।
श्री भारती : आप कौन होते हैं ऐसा कहने वाले? यह किसने कहा?
श्री नजीरुद्दीन अहमद : जरा बाहर जाइए और देखिए। अगर आप कल गांधी मैदान पर जाते तो ऐसा ही कुछ देखते।
एक माननीय सदस्य : मेरे माननीय मित्र वहाँ क्यों गये?
श्री नजीरुद्दीन अहमद : यह मेरा कार्य है कि मैं इसकी जानकारी दूँ, उनको सुझाव देना, उन्हें नियंत्रित करना, उनका मार्गदर्शन करना और उन्हें गुमराह करना मेरा कार्य नहीं है, एक सदस्य होने के नाते, मुझे जनमत का आंकलन करना होता है। यदि मैं जानता हूँ कि हिंदू मत एक विशेष दिशा की ओर झुका है तो मैं पिछड़ा कहे जाने का जोखिम उठाते हुए भी इस बारे में सदन को सूचित करूँगा। इसमें व्यावहारिक ज्ञान और न्याय की आड़ में बनावटीपन और चतुरता दिखाने की कोशिश करना व्यर्थ है।
कुछ सदस्यों ने मुझसे अप्रत्यक्ष रूप से पूछा कि ‘‘ऐसा कौन कहता है?’’ वे समझते हैं कि हिंदू समुदाय ने संहिता को स्वीकार कर लिया है और वे इस पर सहमत हैं। मैं बंगाल क्षेत्र से हूँ। उनके मत वाली सरकार के अनुरोध पर उन्होंने कहा कि वे इसका विरोध करते हैं।
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श्री नजीरुद्दीन अहमद : यदि वे अब बदल रहे हैं तो मुझे इसकी जानकारी नहीं है।
श्रीमती दुर्गाबाई : उनके साथ-साथ आपको भी अवश्य बदलना चाहिए।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मेरे विचार से उन्होंने हाल ही में अपना कोई मत व्यक्त नहीं किया है। अफवाहों के अलावा, सरकार द्वारा स्वीकृत उनके विधिक मत को उनके न्यायिक सचिव द्वारा भेज दिया गया है और इसे हमें परिचालित भी कर दिया गया है। कोई अन्य मत हमें परिचालित नहीं किया गया है। यदि ऐसा कोई मत किसी