खंड 2 : (संहिता का प्रयोग) - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री राज बहादुर : मैं जान सकता हूँ कि क्या सदस्य को विधेयक के मूल आधार और सिद्धांत पर आक्षेप करने की अनुमति है? क्या वह खंड-2 पर अथवा सम्पूर्ण विधेयक पर बोल रहे हैं?

सरदार हुकम सिंह : यह उनके वक्तव्य कि हिंदू ऐसा नहीं चाहते हैं, के सम्बन्ध में उत्पन्न व्यवधान का उत्तर था।

माननीय अध्यक्ष : शांति! शांति! अब तक माननीय सदस्य की टिप्पणियां संशोधन संख्या-31 के अंतर्गत प्रासंगिक थीं। परन्तु, मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि उन्हें टिप्पणियां करते समय अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहिए। उन्हें अपने संशोधन में उठाये गये मुद्दों पर की गई टिप्पणियों तक ही सीमित रहना चाहिए।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : हमारे समक्ष यह प्रश्न है कि क्या कानून उन लोगों

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पर भी लागू किया जाना चाहिए जो इसका पालन करने के लिए सहमत नहीं होते हैं। यदि आप उन्हें छूट नहीं देते हैं तो आप उन लोगों पर कानून लादते हैं जो इसे नहीं चाहते हैं। इसीलिए मैंने सोचा कि उस मुद्दे पर बल देने के लिए प्रमुख अधिकारियों जैसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और बंगाल सरकार की आपत्ति प्रासंगिक थी। इससे पता चलता है कि लोग इसके विरुद्ध हैं : न कि पिछड़े लोग बल्कि प्रतिभावान और सभ्य लोग जिनका समाज में कुछ स्तर है। इसका जिक्र करने का मेरा यही उद्देश्य था।

इसलिए, मेरा कहना है कि इन आपत्तियों को देखते हुए उन लोगों पर भी कानून लागू किया जाना चाहिए जो विशेषतः इसके समर्थन में हैं और जो समझते हैं कि वे इससे लाभान्वित होंगे, परन्तु वे उन पर लागू नहीं किया जाना चाहिए जो इसे नहीं चाहते हैं। मेरा कहना है कि जो लोग हिंदू संहिता विधेयक के विरुद्ध हैं वे सदन में अल्पसंख्या में हैं तथा जो लोग इसके पक्ष में हैं वे देश में सूक्ष्मदर्शकीय अल्पसंख्या में हैं। वास्तव में प्रश्न यह है कि क्या आपके लिए यह विचार व्यक्त करना पर्याप्त है कि यदि लोग हिंदू संहिता विधेयक नहीं चाहते हैं तो उनके लिए यह अच्छा है? लोकतांत्रिक समाज में आपको कोई लाभ उन लोगों पर नहीं थोपना चाहिए जो इसे नहीं चाहते हों। लोग इसे नहीं चाहते हैं। इसलिए, आपको इसे उन पर जबरदस्ती नहीं थोपना चाहिए। मैं दो माननीय सदस्यों द्वारा दिये गये उन दो सुझावों का समर्थन करता हूँ कि पहले उन लोगों के लिए कानून लागू किया जाना चाहिए जो इसे चाहते हैं। तत्पश्चात्, यदि हम देखते हैं कि इसे सुगमता से स्वीकार किया जा रहा है, पर हिंदुओं के लिए अनुकूल है, वे इसे चाहते हैं और वे इसे सहजता से स्वीकार कर लेते हैं तो यह संसद इसे बाद में अन्य वर्ग के लोगों पर भी लागू कर सकती है। यही उचित तरीका है, जैसा कि सुझाव दिया गया है,