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यदि हम इसे एक बार सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लेते हैं तथा इसे स्वैच्छिक रूप से लागू करते हैं तो सम्पूर्ण विवाद समाप्त हो जाएगा। सदन के बाहर बहुमत और सदन के अन्दर अल्पमत की कड़वाहट एकदम समाप्त हो जायेगी। तब मतभेद का प्रश्न ही नहीं उठेगा। यदि यह अच्छा है तो यह समाज के उच्चतम वर्ग के लिए अच्छा है। यह उन लोगों के लिए अच्छा नहीं है जो मध्यम और निम्न वर्गों के हैं। इसीलिए, मैं समझता हूँ कि उस संशोधन में दिये गये सुझाव को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।
मेरा एक संशोधन यह है कि उप-खंड (3) को हटा दिया जाना चाहिए, यह उप-खंड निम्नलिखित है :-
‘‘इस संहिता के किसी भी भाग में ‘हिंदू’ शब्द में एक ऐसे व्यक्ति को शामिल समझा जायेगा जो यद्यपि धर्म से हिंदू न हो परन्तु इस संहिता के प्रावधानों के अंतर्गत आता हो।’’
इसके अनुसार, यद्यपि एक व्यक्ति हिंदू नहीं है, परन्तु यदि उस पर यह विधेयक लागू होता है तो वह हिंदू है। यही बड़ा प्रश्न है। यह कहा जा सकता है कि हिंदू, हिंदू ही है। प्रारूप तैयार करने वाला व्यक्ति संतुष्ट नहीं था और उसने भ्रामक शब्दों का इस्तेमाल करके नया उप-खंड (3) को जोड़कर इसे और जटिल बना दिया। आप इस संहिता को किस पर लागू करेंगे? यदि आप कहते हो कि एक आदमी जो मानव है, आदमी ही है, तो इससे क्या फायदा? इससे मस्तिष्क की घबराहट का पता चलता है। आप यह नहीं कह सकते हैं कि एक हिंदू, हिंदू नहीं है, परन्तु यद्यपि वह हिंदू नहीं है, कोई संहिता लागू की स्थिति में वह हिंदू हो जाता है। मेरे विचार से सरलता का दृष्टिकोण सबसे अधिक संतोषजनक और बेहतर होगा, यदि आप कहते हो कि दो पैर और दो हाथ वाले व्यक्ति हिंदू हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। यदि आप कहते हो कि सभी हिंदू-हिंदू हैं, तब तो कुछ मतलब बनता है। आप कहते हो कि सभी हिंदू-हिंदू हैं, सभी जैन, बौद्ध और सिख हिंदू हैं, उनके अवैध बच्चे हिंदू हैं तथा वे सभी हिंदू हैं जो मुसलमान, ईसाई, पारसी और यहूदी नहीं हैं। आप अभिव्यक्ति के इस चक्रीय तरीके से संतुष्ट नहीं हैं। आप कहते हैं कि यद्यपि एक व्यक्ति हिंदू नहीं है, परन्तु जब उस पर यह संहिता लागू होती है तो वह हिंदू हो जाता है। आपको अपनी अभिव्यक्ति में अधिक स्पष्ट और तार्किक होना चाहिए। इस खंड के प्रारूप से पता चलता है कि इसमें कई व्यक्ति शामिल थे परन्तु उसे उचित तरीके से प्रारूपित नहीं किया गया। इसीलिए, इसमें अस्पष्टता है और इतनी अधिक जटिल अभिव्यक्ति की गई है। मेरा कहना यह है कि उप-खंड (3) को हटा दिया जाना चाहिए। हिंदू वही होना चाहिए जो हिंदू धर्म अपनाता हो, बौद्ध, जैनियों