62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं कह रहा था कि इस सदन को विधेयक पारित
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करने के लिए देश की जनता का आदेश प्राप्त नहीं है। यह एक मूल विषय है जो भारत के धार्मिक और सामाजिक ढांचे को प्रभावित कर रहा है। इसलिए, हमारी वास्तविक स्थिति पर विचार करना उचित और प्रासंगिक है। मैं सम्पूर्ण इतिहास पर विस्तार से चर्चा नहीं कर रहा हूँ क्योंकि यह उचित स्तर पर हो चुकी है, परन्तु मैं इस तथ्य को नहीं भूल सकता हूँ कि इस सदन के अधिकांश सदस्य नये हैं और वे उस समय उपस्थित नहीं थे। इसलिए उन मुद्दों को सारांश में बताना अप्रासंगिक नहीं होगा।
माननीय अध्यक्ष : मैं माननीय सदस्य को बताना चाहूँगा कि जहाँ तक इस सदन
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का प्रतिनिधित्व स्वरूप और इसके द्वारा ऐसे विधेयकों पर विचार करने की शक्ति का प्रश्न है, इसे पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था और इस तरह की बहस दोबारा उठाने के लिए यह उपयुक्त समय नहीं है। अब हम खंड-वार इस विधेयक पर चर्चा कर रहे हैं और खंड-2 पर सदन में विचार-विमर्श चल रहा है। इसलिए, वह अपनी टिप्पणियों को खंड-2 में निहित प्रावधानों और सदन के समक्ष प्रस्तुत संशोधनों तक ही सीमित रखेंगे। निःसंदेह, इसके लिए काफी गुंजाइश है, परन्तु सदन के प्रतिनिधित्व स्वरूप यह प्रश्नचिन्ह लगाने अथवा उस पर शंका करने अथवा विधेयक को पारित करने की इसकी क्षमता पर प्रश्न उठाने के लिए नहीं। यह तो उन बातों को दोबारा दोहराने जैसा है जो पिछले चरणों में कही जा चुकी हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : महोदय, मैं आपके विनिर्णय का पालन करता हूँ मैं
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सदन के प्रतिनिधित्व स्वरूप और इसकी क्षमता पर प्रश्न नहीं उठा रहा हूँ, परन्तु प्रश्न यह है कि हमने लोगों की सलाह नहीं ली है। ऐसा नहीं है कि हमारा कोई क्षेत्राधिकार नहीं है और ना ही हम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, परन्तु इस तरह सामाजिक विधान के संबंध में हमें जनमत अवश्य प्राप्त करना चाहिए था। मैं यही बात कहने जा रहा था। मैं इस पर विस्तार से चर्चा नहीं चाहता हूँ। मैंने इसका उल्लेख इसलिए करना चाहा ताकि मैं संशोधन संख्या 31 के संबंध में अपना पक्ष मजबूत कर सकूँ। मैं इस संशोधन के जरिये इस विधेयक के कार्यान्वयन को विभिन्न राज्यों के लिए अथवा राष्ट्र तक सीमित करना चाहता हूँ ताकि अधिनियम में इसके कार्यान्वयन का उल्लेख हो सके। मैं उन शर्तों को भी सीमित करना चाहता हूँ जिनके आधार पर विधेयक लागू होता हो, जिन लोगों और वर्गों पर यह विधेयक लागू हो तथा जिस चरण अथवा जिन चरणों के माध्यम से यह लागू हो। इसलिए मेरा कहना यह है कि जहाँ इस संशोधन का प्रश्न है, इस विधेयक को सभी व्यक्तियों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।