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श्री नजीरुद्दीन अहमद : नहीं, महोदय। स्पष्टीकरण के तौर पर एक शब्द जरूरी है। यद्यपि मैंने इसका उल्लेख नहीं किया होगा, परन्तु आरोप, निश्चित रूप से लगाया गया है और यह सौ वर्षों के बाद तक भी इस सदन की कार्यवाही का हिस्सा बना रहेगा। विलम्ब का दूसरा कारण यह था कि जिस विधेयक को प्रवर समिति को भेजा गया था उसमें व्यापक परिवर्तन किये गये थे और उन्हें सदन के समक्ष केवल यह तर्क देने के लिए रखा जाना था कि प्रवर समिति के सदस्यों को विस्तार से उन पर विचार करने का उचित अवसर नहीं मिला था। अब वह विवाद
खत्म हो गया है परन्तु लोगों की याददाशत कमजोर है और मंत्रियों की स्मरण शक्ति इससे भी कम है। संयोगवश मुझे विलम्ब के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। मेरे विचार से इस पर चर्चा करना अनावश्यक है। जहाँ तक इस विषय का संबंध है, जैसा कि डॉ. पट्टाभिसीतारमैया ने एक बार कहा था, विलम्ब की चाल चलना भी स्वीकार्य है। यदि वह चाहते हैं तो वह जब तक चाहें उसका निष्पक्षता से अथवा कपटता से विरोध कर सकते हैं। मैं ऐसा कठोर कदम नहीं उठता हूँ। मैं समझता हूँ कि यह विधेयक विवादित है। तथा इसमें कुछ विवाद होना लाजिमी है। विधेयक में ही विवाद निहित है। डॉ. देशमुख (मध्य प्रदेश) : डॉ. अम्बेडकर में?
श्री नजीरुद्दीन अहमद : हाँ, निस्सन्देह, जब प्रारूप विधेयक परिचालित किया गया था तब हिंदू आयोग देश भर में गया था और उसने अनेक मत एकत्रित किये थे। ये मत अधिकांशतः विधेयक के विपक्ष में थे। जो महिलाएँ स्वयं को मुक्त करने के लिए बेचैन हैं उन्होंने भी इस विधेयक के माध्यम से अधिक संख्या में आयोग की बैठकों का विभिन्न स्थानों में विरोध किया था।
श्री त्यागी (उत्तर प्रदेश) : इस समय खंड-2 पर चर्चा हो रही है। इन सब बातों का इससे क्या लेना-देना है?
माननीय अध्यक्ष- पीठासीन अधिकारी को इस बात का ध्यान है, परन्तु यदि माननीय सदस्य ऐसा करना चाहते हैं तो वे कर सकते हैं और इस परिस्थिति में उनके भाषण लम्बे हो जायेंगे तथा कल शाम तक यही चर्चा चल सकेगी। इसलिए, उन्हें अपना भाषण जारी रखने दें। यदि वह अप्रासंगिक बात बोलते हैं तो उन्हें पीठासीन अधिकारी रोकेगा।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : महोदय, इन व्यवधानों से निश्चित रूप से कठिनाई उत्पन्न होती है। जब कोई प्रश्न पूछा जाता है तो निश्चित रूप से उसका उत्तर जरूरी है। मैं इन व्यवधानों से विचलित नहीं होता हूँ तथा इन व्यवधानों को मैं स्वीकार कर लेता हूँ।