66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महोदय, खंड-2 बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संहिता के कार्यान्वयन से संबंधित है। इस खंड के संबंध में कई संशोधनों के सुझाव दिये गये हैं, और इनका मुख्य उद्देश्य यह रहा है कि इसके शीघ्र और व्यापक कार्यान्वयन को रोका जाए। विधेयक के महत्व को देखते हुए मैं यह महसूस करता हूँ कि सदन को विधेयक को जल्दी में लागू न करने तथा उसे स्थानीय स्थितियों के अनुरूप लागू करने संबंधी सुझाव पर गम्भीर विचार करना चाहिए। यदि ऐसा किया जाता है तो विधेयक का प्रभाव अधिक सराहनीय होगा तथा अधिकांश आपत्तियाँ समाप्त हो जायेंगी।
महोदय, मुझे इतना ही कहना है।
* पंडित ठाकुर दास भार्गव (पंजाब) : महोदय, विभिन्न विषयों और लोगों, जो
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खंड-2 के अंतर्गत आते हैं, पर हिंदू संहिता विधेयक लागू करने के संबंध में मैं आप के विचारार्थ कुछ शब्द कहना चाहूँगा।
मैं अपने पूर्व वक्ता से सहमत हूँ कि खंड-2 का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक है और इसलिए सदन के विचारार्थ जो भी मामले प्रस्तुत किये गये हैं वे उपयुक्त और सही हैं और उन पर सदन को विचार करना चाहिए। परन्तु साथ ही मेरा मन है कि व्यावहारिक रूप से, हम खंड-2 के कार्यक्षेत्र को उन लोगों तक सीमित रखने के लिए मजबूर हैं जिन पर पहले हिंदू कानून लागू होता था। मैं उन लोगों के प्रयासों को कम करने के लिए यहाँ खड़ा नहीं हुआ हूँ जो यह सोचते हैं कि नीति निदेशक तत्वों के अनुसार हमें इस देश के लिए एक नागरिक संहिता की आवश्यकता है। मैं इसके पक्ष में हूँ, सारा देश इसके पक्ष में है, इसलिए, हमें देश के लिए एक नागरिक संहिता बनाने का प्रयास करना चाहिए और मैं यह चाहूँगा कि डॉ. अम्बेडकर, जिन्होंने संविधान देने तथा हिंदू संहिता जो करीब 30 करोड़ लोगों को प्रभावित करता है, को प्रस्तुत करने के मामले में इस देश के लिए बहुत कुछ किया है, सम्पूर्ण देश के लिए नई नागरिक संहिता प्रस्तुत करेंगे।
परन्तु साथ ही, मैं नहीं समझता कि यह कहना व्यवहार्य है कि इस हिंदू संहिता को नागरिक संहिता में बदला जाना चाहिए, (एक माननीय सदस्य; क्यों नहीं?) यह प्रश्न पूछा जा रहा है कि ‘क्यों नहीं?’ मैं निश्चित रूप से इसका कारण बताना चाहूँगा। जैसा कि मैंने अभी कहा है, मैं अपने पूर्व वक्ताओं, श्री सरवटे, श्री विद्यावाचस्पति और श्री जसपत राय कपूर की भावनाओं की प्रशंसा करता हूँ। वे पूरे देश के लिए एक नागरिक संहिता चाहते हैं। वास्तव में, कुछ नियम जो हिंदू संहिता के वास्तविक आधार रहे हैं, को शामिल करने में डॉ. अम्बेडकर का यह प्रयास सराहनीय है। कुछ
* सं. वा. वि., खंड : VIII, भाग- II, 6 फरवरी, 1951, पृष्ठ 2430-52