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लोगों के अनुसार, यह हिंदू संहिता एक ऐसी संहिता है जिसे केवल हिंदुओं पर ही लागू नहीं होना चाहिए क्योंकि इसमें ऐसे सिद्धांत निहित है ंजो मात्र हिंदू कानून से ही नहीं लिए गये हैं कुछ सिद्धांतों के संबंध में, ये इतने विस्तृत हैं कि मेरे विचार से वे एक नागरिक संहिता बनाने के लिए आधार प्रदान कर सकते हैं।
जैसा कि पूर्व वक्ता ने कहा है, विवाह निश्चित रूप से दस संस्कारों में से एक है। यह एक धार्मिक कार्य है। परन्तु इस संहिता में हमने मैरिज एक्ट के प्रावधानों को भी शामिल किया है। मेरा कहना है कि जहां तक सिविल मैरिज का प्रश्न है यह नागरिक संहिता में निहित है और उसका हमें ध्यान है तथा यह देश के सभी नागरिकों के लिए अच्छा होगा। इसलिए यह शिकायत कि हिंदू संहिता न तो हिंदू कानून पर आधारित है और न ही सार्वभौमिक कानून पर, कुछ हद तक सही है और मेरा मत यह है कि सिविल मैरिज एक्ट के जो सिद्धांत 1872 के अधिनियम में शामिल हैं, उन्हें हिंदू संहिता में शामिल नहीं किया जाना चाहिए था इसलिए, मैं चाहता हूँ कि इन प्रावधानों को वापस लिया जाये और हिंदू संहिता को केवल हिंदू संहिता ही रहने दिया जाये। सिविल मैरिज एक्ट के प्रावधानों को हिंदू संहिता में मिलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी।
महोदय, अब तो मैं मानता हूँ कि आज हम उस तरह का हिंदू कानून लागू नहीं कर सकते हैं जिसे हमारे पूर्वजों ने प्रतिपादित किया था। उन दिनों, हिंदू एक अलग तरह का जीवन व्यतीत करते थे। जहाँ तक हिंदुओं का संबंध था, तब सभ्यता और अन्य धर्मों का प्रभाव शुरू नहीं हुआ था। अब प्रत्येक संहिता चाहे वह मुस्लिम कानून, ईसाई कानून अथवा हिंदू कानून हो, इनमें ऐसे सिद्धांत हैं जो केवल उन कानूनों से संबंधित ही नहीं हैं, बल्कि जिन्हें वास्तव में अन्य तलों के प्रभाव से सार्वभौमिक बना दिया गया है। उदाहरणार्थ, इस हिंदू संहिता में एक ही बार विवाह करने का प्रावधान है और यह ईसाई कानून की भी मुख्य विशेषता है। हिंदू संहिता के रचयिता यह चाहते हैं कि पुत्रियों को जायदाद का हिस्सा दिया जाना चाहिए। जहाँ तक विवाहित पुत्रियों का संबंध था, हिंदू कानून को इस संबंध में लम्बे समय तक कोई जानकारी नहीं थी। निःसंदेह, ऐसी कोई प्रथा और सिद्धांत नहीं है जिसे हिंदुओं द्वारा समय-समय पर प्रयोग में न लाया गया हो।
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यह एक अलग मामला है, परन्तु आज मैं यह समझता हूँ कि वह बहुत ही साहसी पुरुष होगा जो यह कहना चाहेगा कि प्राचीन सिद्धांतों को हिंदू संहिता में सम्मिलित किया जाए। जैसे-जैसे समाज प्रगति करता है, सिद्धांत भी उन्नत होते