68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाते हैं। अब यदि कोई यह कहना चाहता है कि मनु के कानूनों को लोकतांत्रिक भारत में लागू किया जाना चाहिए, मेरे विचार से वह पागल आदमी होगा। इस सदन में क्या कोई यह चाहता है कि किसी भी शूद्र को श्रुतियां पढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए? इसके विपरीत मैं इस कारण संहिता का स्वागत करूंगा क्योंकि डॉ. अम्बेडकर इसे समर्थन दे रहे हैं। अब सभी चीजें बदल गई हैं, सभी मूल्य बदल गये हैं। अब तक हिंदू अटल रहे हैं, वही आदमी साहसी होगा जो यह कहेगा कि ‘‘मैं चाहता हॅँ कि हिंदुओं की जाति-व्यवस्था जो जन्म पर आधारित है, को हिंदू संहिता में सम्मिलित किया जाना चाहिए,’’ मुझे इस हिंदू संहिता से कुछ लेना-देना नहीं है यदि यह जातीय सिद्धांत पर आधारित हो। मैं जानता हूँ कि जहाँ तक मूल हिंदू कानून का संबंध है, जाति प्रणाली, जन्म पर आधारित नहीं थी, मैं इस सदन में अथवा सदन के बाहर हर किसी को ललकारता हूँ कि यदि वह मुझे यह आश्वस्त कर सके कि हिंदू कानून अथवा पद्धति जन्म पर आधारित थी, परन्तु आज हम क्या देखते हैं? जाति का वास्तविक आधार जन्म ही है, जबकि हिदू कानून और शास्त्रों के कड़े मत के अनुसार जन्म का इसमें कोई स्थान नहीं है। हम यह देखते हैं कि हिंदू समाज वैसा नहीं है जैसा यह पहले था। क्या अब मनु के उन सभी कानूनों को लागू करने जा रहे हैं जिसमें यह कहा गया है कि शूद्र, श्रुतियाँ आदि नहीं पढ़ सकते हैं? अब हमने उन्हें हटा दिया है।
जहाँ तक इस आलोचना का प्रश्न है कि संहिता बहुत खराब है और इसे केवल हिंदुओं, मुसलमानों आदि पर लागू किया जाना चाहिए, मुझे खेद है कि मुझे इस कथन को चुनौती देनी पड़ी और उसका सामना करना पड़ा। विधेयक में कुछ सिद्ध ांत ऐसे हैं, जो बहुत ही अच्छे हैं और मैं इस हिंदू संहिता के पक्ष में हूँ। मैं चाहता हूँ कि सभी अच्छे सिद्धांतों को जो इन सिद्धांतों के अनुरूप है जिन्हें हमने अपने समाज में आज स्वीकार कर लिया है, को इस सदन में पारित किया जाना चाहिए। मैं कतिपय व्यवधानों के पक्ष में नहीं हूँ और मैं उचित समय पर इन पर बोलूँगा। परन्तु, यह कथन कि यह विधेयक बहुत खराब है और इसे हिन्दुओं और मुसलमानों आदि पर लागू नहीं करना चाहिए। मैं इससे सहमत नहीं हूँ।
मैं इस प्रश्न पर विचार कर रहा था कि क्या इसे केवल हिंदुओं पर ही लागू किया जाना चाहिए। इस संबंध में तीन या चार प्रस्ताव किये गये हैं और श्री सरवते, श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति तथा श्री जसपत राय कपूर को इसके बारे में कुछ कहना था। मेरा निवेदन यह है कि यदि ऐसा कानून सम्भव होता तो मैंने स्वयं इन प्रस्तावों का समर्थन किया होता। क्या मैं इस सदन में बैठे गैर-हिंदुओं से विनम्रता से पूछ सकता हूँ कि वे इस प्रस्ताव को पसंद करते हैं या वे इसे पसंद नहीं करते हैं?