70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तलाक, दहेज, गोद लेना, संरक्षण, अल्पसंख्यक, जारजता (दोगलापन), पारिवारिक संबंध, वसीयत, पैतृक संपत्ति, उपहार, विभाजन (बंटवारा), कोई धार्मिक रीति अथवा परम्परा अथवा अन्य चीजों से संबंधित प्रश्न हो।’’
पंजाब के परम्परागत कानून के संबंध में ग्रामीण क्षेत्रों में सभी हिंदू, मुसलमान और सिख उस प्रचलित कानून से बंधे थे जो व्यावहारिक रूप में सभी के लिए समान था। इसने नागरिक संहिता के लिए बहुत ही अच्छा आधार प्रदान किया है क्योंकि प्रथाएं वही थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि हम उत्तराधिकार के सम्पत्ति संबंधी सिद्धांत से जुड़े रहे तथा इसी से सभी प्रथाएं शुरू हुईं। पंजाबियों के लिए विवाहित पुत्रियों को पैतृक संपत्ति देने का सिद्धांत स्वीकार करना मुश्किल है क्योंकि वहां सन्तति संबंधी सिद्धांत प्रचलित है। बंगाल उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आने से पहले असम में भी यही प्रथा प्रचलित थी। यदि हम प्रथा के स्रोत का पता लगाते हैं तो यह पाते हैं कि पूरे देश में प्रचलित हिंदू कानून के सभी सिद्धांत और मत, ही इसके स्रोत थे, जिनसे पंजाब और अन्य क्षेत्रों में यह प्रथा फैली, यह प्रथा पंजाब की एकमात्र विशेषता नहीं है बल्कि भारत के विभिन्न भागों में प्रथा ने मूल हिंदू कानून को काफी हद तक बदल दिया है।
श्री. आर. के. चौधरी : मैं बीच में बोलने के लिए माफी चाहता हूँ। परन्तु मैं पूछ सकता हूँ कि क्या पंजाब में परम्परागत कानून कस्टमरी लॉ हिंदू कानून के स्पष्ट प्रावधानों से ऊपर है अथवा उस विधेयक के पारित होने के बाद पंजाब की क्या स्थिति होगी?
पंडित ठाकुर दास भार्गव : जहाँ तक पंजाब कानून का संबंध है, मैंने कानून के स्रोत के बारे में बता दिया है अर्थात् पंजाब कानून अधिनियम की धारा-5, पंजाब के संबंध में, मैंने रैट्टीगन की प्रारम्भिक टिप्पणियां, जो 1825 के विनियमन और 1872 के अधिनियम की धारा-5 पर आधारित हैं से धारा-1 से पढ़ा है। जब तक इसे हिंदू संहिता के जरिये न बदला जाए, यही पंजाब वर्तमान कानून है। जब मैंने इस संबंध में संशोधन दिया था, यही मेरी कठिनाई थी। यदि पंजाबी लोग अपने रिवाज से चलना चाहते हैं तो उन्हें चलने देना चाहिए। मैंने खंड-1 के संबंध में एक संशोधन दिया है और इसके अनुसार पंजाब को इसके क्षेत्राधिकार से मुक्त रखा जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि बहुत समय पहले से हम रीति-रिवाजों के अनुसार चल रहे हैं और हम उसी रिवाज या प्रथा से बंधे रहना चाहते हैं, क्योंकि वह हिंदू कानून तथा सिविल कानून के अन्य विचारों का मिश्रण है।
यदि मैं हिंदुओं की वर्तमान मानसिकता के विषय से हटकर एक मिनट बोलना चाहूँ तो मुझे माफ करना। मैं इस देश में एक ऐसा हिंदू देखना चाहता हूँ जो यह कह