74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भाग हैं। किसी भी व्यक्ति को विवाह से संबंधित भाग को चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। ताकि वह कह सके कि ‘‘मैं इस अध्याय में नियमित रहना चाहता हूँ,’’ मैंने कभी नहीं कहा कि किसी व्यक्ति को एक विशेष भाग स्वीकार करना चाहिए तथा अन्य को कोई दूसरा भाग।
पंडित ठाकुर दास भार्गव- मुझे खेद है कि मेरे माननीय मित्र ने मेरे कथन को
| Col1 | Col2 |
|---|---|
| xZ |
विवादास्पद बना दिया है। मैंने उन्हीं के शब्दों में यह प्रश्न रखा था और उन्होंने उसका उत्तर दिया। उनका उत्तर था कि वह चाहेंगे कि एक विशेष भाग को चुना जा सके। दुर्भाग्यवश, उन्हें यह याद नहीं है।
श्री जे. आर. कपूर : वह मेरे द्वारा कल दिये गये भाषण को पढ़ सकते हैं।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : उस भाग को पढ़ने के बाद मैंने देखा है कि मैं वहीं बातें कह रहा हूँ।
श्री जे. आर. कपूर : मेरा अनुभव है कि यह ऐसा नहीं है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं मान लेता हूँ कि जो मेरे मित्र ने कहा था, वही सत्य है।
मैं अपने मित्र से पूछ सकता हूँ कि क्या वह चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति हिंदू संहिता चुन सकता है और विवाह के संबंध में कह सकता है कि वह हिंदू कानून का पालन करेगा परन्तु उत्तराधिकार के मामले में वह किसी अन्य कानून का पालन करेगा? यह कहना किसी भी व्यक्ति के लिए कठिन होगा कि वह हिंदू संहिता केवल एक ही अध्याय से बंधा रहेगा और अन्य से नहीं, सम्पूर्ण कानून के अध्याय इस तरह आपस में जुड़े हैं कि कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता है कि वह केवल एक ही उपबंध से बंधा रहेगा तथा दूसरे अध्याय के अन्य उपबंधों से नहीं, यह पूर्णतः गलत धारणा है। उत्तराधिकार, निर्वाह, संरक्षण, ये सभी प्रावधान वास्तव में इस तरह एक-दूसरे से जुड़े हैं कि ऐसी धारणा बनाना असम्भव होगा। कल, जब मैंने प्रश्न रखा था तो वह उस मानव धारणा को दूर करने के उद्देश्य से था जिसे मेरे मित्र सम्पूर्ण भारत के लिए निर्धारित करना चाहते थे। इनके अनुसार, एक मुसलमान यह कह सकता है कि वह किसी अमुक अध्याय को चाहता है और उसी से वह बंधा रहेगा तथा रोज अध्यायों के संबंध में, वह मुस्लिम कानून का पालन करेगा। मैं पूछता हूँ कि क्या यह सम्भव है, क्या यह व्यवहार्य है, क्या इस धारणा को सदन के समक्ष रखा जा सकता है? मेरा निवेदन है कि यह विषयगत प्रश्न के प्रति गलत दृष्टिकोण होगा। वास्तव में, यह विषयगत प्रश्न नहीं है।