हिंदू कोड - जारी - Page 94

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जा रहा है तथा इन अनुच्छेदों के संदर्भ में, हम हिंदू संहिता जैसे कानून को लागू नहीं कर सकते हैं। परन्तु वास्तव में, ऐसा नहीं है। मैं यह निवेदन करूँगा कि डॉ. अम्बेडकर द्वारा सुझाये गये संशोधनों से भी यह धारा स्पष्ट नहीं होगी, इसीजिए, मैंने अपने संशोधन सुझाये हैं।

मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद ने यह शिकायत की कि हिंदू संहिता को उन लोगों पर लागू करने का प्रयास किया जा रहा है जो हिंदू नहीं है। परन्तु, मेरा विनम्र निवेदन है कि मेरे मित्र का यह कहना सही नहीं है कि यदि मेरे मित्र यह देखते हैं कि यह किस पर लागू होता है, उन्हें पता चलेगा कि यह उन कई लोगों पर लागू होता है, जो उस अर्थ में हिंदू नहीं है जिसमें इस शब्द को आज भी सार्वजनिक रूप से समझा जाता है। यदि आप गौड़ की टिप्पणी पर नजर डालोगे : मेरे विचार से यह पृष्ठ 165 पर है : आप देखेंगे कि कई व्यक्ति जो अपने को हिंदू नहीं कहते हैं, हिंदू कानून से नियंत्रित होते हैं। मैं कह सकता हूँ कि यह भौगोलिक रूप से जो हिंदू हैं, उन पर लागू होता है। हिंदू व्यवस्था एक पंथ नहीं है। ‘हिंदू’ शब्द की भौगोलिक महत्ता भी है। इसलिए, मुसलमान, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी जैसे अन्य विशेष कानूनों से जो लोग बंधे नहीं हैं, वे हिंदू नियम से बंधे हैं। डॉ. अम्बेडकर ने कोई नई बात प्रस्तुत नहीं की है। वह नहीं चाहते हैं कि जो हिंदू नहीं हैं उन्हें हिंदू कानून के अंतर्गत आना चाहिए। मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा दिया गया यह तर्क गलत है। यह धर्म परिवर्तन का प्रश्न नहीं है। यदि किसी व्यक्ति पर हिंदू कानून लागू होता है तो वह इससे हिंदू नहीं बन जाता है। यदि वह हिंदू कानून के उत्तराधिकार, तलाक और विवाह सम्बंधी कुछ नियमों को अपनाता है तो वह हिंदू नहीं बन जाता है। मैं यह भी कहता हूँ कि इस तरह की बातों से हमें कोई मदद नहीं मिलती है। हिंदुओं और मुसलमानों की संख्या बढ़ाने से क्या फायदा है? समानुपातिक प्रतिनिधित्व अथवा विशेष प्रतिनिधित्व व्यवस्था के दिन अब नहीं रहे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई हिंदू है अथवा मुसलमान अथवा पारसी अथवा यहूदी, बशर्तें कि वह एक अच्छा नागरिक हो। मैं नहीं चाहता कि कोई अपना धर्म छोड़े। मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद का तर्क उस पुरानी मानसिकता पर आधारित है कि हिंदुओं का अनुपात अवश्य अधिक होना चाहिए अथवा मुसलमानों का कम होना चाहिए अथवा पारसियों का अधिक होना चाहिए इत्यादि, इत्यादि। वास्तव में,

खंड-2 की विषय-वस्तु पुराने हिंदू कानून से ली गई है। इसका प्रथम भाग कहता है कि यह संहिता सभी हिंदुओं पर लागू होगी अर्थात् उन सभी व्यक्तियों पर जो हिंदू धर्म को विराशैव सहित किसी अन्य रूप में मानते हैं। मेरा विनम्र निवेदन है कि खंड का यह भाग अनावश्यक है। यदि यह हिंदुओं पर लागू होता है तो यह पर्याप्त है। यह कहना ठीक नहीं है कि यह हिंदू धर्म के सभी रूपों अथवा हिंदू धर्म