हिंदू कोड - जारी - Page 96

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एक माननीय सदस्य : इसमें क्या बुराई है?

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पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं चाहता हूँ कि सारा पंजाब और भारत को इस संहिता के अंतर्गत लाया जाना चाहिए। हमारे कानूनों के बारे में कुछ एकरुपता होनी चाहिए। मैंने एक संशोधन रखा है कि जहां तक हमारी परम्पराओं का संबंध है। उन्हें संरक्षण मिलना चाहिए। मैंने यह भी सुझाव दिया है कि इस संहिता की धाराओं में इस ढंग से छूट दी जानी चाहिए कि यदि राज्य की विधानसभा संहिता के कुछ भागों को लागू करना चाहती है तो उन्हें लागू किया जाना चाहिए। मैंने यहाँ तक भी कहा कि उत्तराधिकार जैसी परम्पराओं के संबंध में हमें अपने कानूनों को अपनाने की अनुमति मिलनी चाहिए। साथ ही, मैं शेष भारत से अलग नहीं होना चाहता हूँ। वास्तव में हिंदू संहिता का आधार वही है। यदि मैंने डॉ. अम्बेडकर के भाषण को, जो उन्होंने विधेयक पर विचार के चरण में दिया था, सुना होता, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह इस संहिता को संपूर्ण भारत पर लागू करना चाहते हैं तथा ऐसी बातें जो हिंदू प्रथाओं में उनकी प्राचीन रीति के दौरान समाविष्ट हो गई थीं, उन्हें संशोधित रूप में लाया जाना चाहिए। मुझे याद है, उन्होंने कहा था कि जो भी खामियाँ हैं उन्हें दूर किया जाना चाहिए। मैं उनकी बात का समर्थन करता हूँ तथा मैं नहीं चाहता कि पंजाब को हिंदू संहिता के अंतर्गत नहीं रखा जाये। मैं अपनी मर्जी से चलने के बजाय सम्पूर्ण भारत पर लागू होने वाले संहिता के अनुसार चलना पसंद करूंगा। इसलिए, मैं चाहता हूँ कि इस प्रावधान को या तो हटा दिया जाना चाहिए अथवा इस तरह से इसमें संशोधन किया जाना चाहिए ताकि ये व्यक्ति इससे अलग न किये जा सकें।

यदि मेरे संशोधन को स्वीकार किया जाता है तो उप-खंड (3) और (4) की आवश्यकता नहीं रहेगी। मेरे विचार से वे सभी व्यक्ति जिन पर वर्तमान नियम लागू होता है, मेरे संशोधन में उल्लिखित पांच श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं। मेरा संशोधन वास्तव में उन्हीं उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कहता है, जो विधेयक के प्रस्तुतकर्ता के ध्यान में हैं, केवल शब्दावली भिन्न हैं। परन्तु मैं उनसे सहमत हूँ कि जहाँ तक विधेयक का कार्यक्षेत्र है इसे उन व्यक्तियों पर भी लागू किया जाना चाहिए जिन पर वर्तमान में हिंदू कानून लागू होता है तथा केवल मुसलमानों, ईसाईयों और यहूदियों को इससे अलग रखा जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मैं किसी अन्य प्रयोजन से उन्हें अलग रखना चाहता हूँ बल्कि इस प्रयोजन से कि वे लोग स्वयं ही इस संहिता के अंतर्गत नहीं आना चाहेंगे। यदि वे सोचते हैं कि वे संहिता के प्रावधानों से बंधा रहना चाहेंगे तो उन्हें इस संबंध में एक संकल्प अथवा प्रस्ताव पारित करना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि नागरिक संहिता का वास्तविक आधार हिंदू संहिता ही होनी चाहिए। मैं नहीं चाहता हूँ कि संहिता में ऐसे मूल तत्व शामिल किये जाने चाहिए जो भावी नागरिक संहिता मूल-तत्वों के साथ मेल न खायें।