हिंदू कोड - जारी - Page 99

84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हम बहुत मजबूत हैं। हमारे मस्तिष्क में विद्रोह होगा और हम ऐसी परम्परा बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करेंगे जिसे हमारे गले में जबरदस्ती उतारा जाये और जिसे हम पचा न सकें। इसका एक प्रभाव यह होगा कि जब पिता की मृत्यु होगी : चूँकि आप पिता को उसकी इच्छानुसार अपनी वसीयत देने की शक्ति दे रहे हो : तो जबरदस्ती वसीयत लिखवाई जाएगी तथा उसके जरिये पुत्री को उत्तराधिकार नहीं मिलेगा, मैं वैसे तो पुत्री के उत्तराधिकार के विरुद्ध नहीं हूँ। जहाँ उसे लागू किया जा सके, जहाँ यह लोगों के विचारों के अनुकूल हो, वहाँ से किसी न किसी तरीके से लागू किया जाना चाहिए। इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। परन्तु प्रश्न यह है कि इसे कुछ स्थानों, जहाँ इसकी आवश्यकता नहीं है, पर लागू करना लाभकारी नहीं हैं। पंजाब में पुत्रियों को यह लाभ उपलब्ध नहीं है। इसका अर्थ यह है कि तुम्हें कुछ भी नहीं मिलता है। मैं जानता हूँ कि शायद मद्रास और अन्य स्थानों पर पुत्रियों को इतना अच्छा नहीं दिया जाता है जितना कि पंजाब में, पंजाब में विवाह के समय पुत्रियों को विवाह में बहुत दहेज दिया जाता है। यदि आप पंजाब में किसी विवाह में : धनी व्यक्ति के घर में : चले जाओ तो आप देखेंगे कि उन्हें हजारों रुपये का दहेज मिलता है। जहाँ तक पिता की स्वयं खरीदी हुई सम्पत्ति का संबंध है, पचास वर्ष पहले उच्च न्यायालय ने एक परिवर्तन किया था। 1909 से पहले पुत्री को अपने माता-पिता द्वारा खरीदी गई सम्पत्ति में से कुछ भी नहीं मिलता था। अब यदि किसी माता-पिता का कोई पुत्र नहीं है तो पुत्री ही सभी खरीदी गई सम्पत्ति की उत्तराधिकारी बनती है। परन्तु मैं यह मानता हूँ कि यह हमारे देश की महिलाओं के साथ पर्याप्त न्याय नहीं है। जहाँ तक अविवाहित लड़कियों का संबंध है, मैं चाहता हूँ कि उन्हें भी लड़कों के बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए : मैं उसे केवल आधा भाग देने के हक में नहीं हूँ। जहाँ तक विवाहित पुत्री का संबंध है, मैं चाहता हूँ कि उसे अपने पति के साथ अपने ससुर की सम्पत्ति का भी उत्तराधिकार मिलना चाहिए, अर्थात् जैसे ही विवाह हो जाता है, पत्नी और पति को अपनी सम्पत्तियां एकजुट कर देनी चाहिएं और आप ऐसे नियम बना सकते हो जिनके द्वारा विवाहित महिला को सम्पत्ति में पूर्ण अधिकार मिल सकें।

मैं नहीं चाहता हूँ कि इस देश की महिलाओं को पूर्ण अधिकार न मिले, बल्कि मैं यही समझता हूँ कि एक महिला को अपने ससुर तथा अपने पिता की सम्पत्ति में अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए। इस पर मुझे आपत्ति है। मैं चाहता हूँ कि समाज और परिवार के विचारों को जबरदस्त ठेस न पहुँचे। इस समय पुत्र ही परिवार की धुरी है। वही परिवार आगे बढ़ाता है। महिला दूसरे परिवार में चली जाती है और उस परिवार को केन्द्र बन जाती है। ऐसा चलता रहना चाहिए। जब तक हमारी, समाज की सम्पूर्ण धारणा नहीं बदलती, हमें इसमें तीव्र परिवर्तन नहीं करने चाहिएं,