15. भाग ‘ग’ राज्य (विधियाँ) विधेयक - Page 108

93

अब, मैं अपने माननीय मित्र द्वारा उठाए गए सांविधानिक प्रश्न पर आता हूँ, अर्थात् यह प्रत्योजित विधान होगा। भाग ‘ग’ राज्यों तक विस्तारित भाग ‘ग’ या भाग ‘ख’ या भाग ‘ग’ राज्यों द्वारा बनाई कई किसी विधि को लागू करना प्रत्यायोजित कहे जा सकने वाले विधान का पालन होगा। संसद द्वारा उस विधान को लागू करने के लिए कार्यपालिका को प्रत्यायोजित किया जाता है। मेरे माननीय मित्र ने प़ेQडरल न्यायालय के विनिश्चय का हवाला दिया है। निःसंदेह फ़ेडरल न्यायालय का विनिश्चय है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि अभी तक हमारे पास उच्चतम न्यायालय का कोई विनिश्चय नहीं है_ हम उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, क्योंकि फ़ेडरल न्यायालय का पूर्ण सम्मान करते हुए, भारत सरकार द्वारा इस मामले में अपनाया गया दृष्टिकोण यह है कि वह विनिश्चय, सही विनिश्चय नहीं था और फ़ेडरल प्राधिकार का पूर्ण आदर करते हुए हमारे द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण अभी भी वही है। मैं अपने माननीय मित्र को बता दूँ कि भारत सरकार की विधान बनाने के लिए प्रयुक्त करने की यह गतिविधि, जिसे प्रत्यायोजित प्राधिकार कहा जाता है, नई नहीं है। व्यावहारिक रूप से यह वर्ष 1912 से अस्तित्व में है और वे पाएंगे कि हमारे पास भारत के किसी भी भाग में बनाई गई विधियों को दिल्ली प्रांत में ऐसे उपांतरों के साथ, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा किए जाएँ, विस्तारित करने हेतु केन्द्रीय सरकार को अनुमति देने के लिए एक विधि है। 1912 से लेकर फ़ेडरल न्यायालय के विनिश्चय नहीं रहा जिसमें भारत सरकार द्वारा की गई कार्यवाही की वैधता पर प्रश्न उठाया गया हो। मैं अपने मित्र को यह भी बता दूँ कि इस देश से बहुत से मामले प्रिवी कौंसिल भेजे गए हैं और प्रिवी कौंसिल ने स्वयं भी इसकी विधिमान्यता पर प्रश्न नहीं उठाया है। अतः मैं आशा करता हूँ जब किसी उचित अवसर पर, मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष आएगा, जो उच्चतम न्यायालय स्थिति की नए सिरे से समीक्षा करेगा और जैसा कि मेरा विचार है, उच्चतम न्यायालय नहीं समझेगा, यद्यपि प़ेQडरल न्यायालय के अनेक कार्मिक वहीं हैं जो उच्चतम न्यायालय के हैं, किन्तु न्यायालय निश्चित रूप से एक भिन्न न्यायालय है। अतः यदि मेरे मित्र पसंद करें तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम जोखिम उठा रहे हैं। हम आशा कर रहे हैं कि जो पक्ष हम लेते हैं और जो पक्ष हम अब तक लेते रहे हैं और जिस पर गत 25 वर्षों के दौरान किसी भी न्यायालय द्वारा प्रश्न उठाया गया है, ठीक पक्ष है। यदि उच्चतम न्यायालय, जब कभी ऐसा मामला उसके समक्ष आए, उस पर विचार करके उससे भिन्न निष्कर्ष पर पहुँचे जैसा कि हमारी राय है, तो फिर हम मामले पर विचार करेंगे। अभी तो वर्तमान में हमारा यह विचार है कि प्रत्यायोजित विधान में किसी भी प्रकार की आपत्ति शक्ति का उसकी ओर से प्रयोग करने के लिए किसी अभिकर्ता से कहने के संबंध में सर्वोच्च है। मैं नहीं समझता कि उस मामले पर प्रश्न उठाया जा सकता है। मैं नहीं समझता कि मेरे मित्र ने कोई अन्य प्रश्न भी उठाया है जिस पर मैंने चर्चा न की हो।